Sunday, 5 January 2020

माँ गुगल पर नहीं मिली

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माँ गुगल पर नहीं मिली
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बचपन गुजर गया
मँ की गोद में सोते हुए
उन दिनों सुख की चाह
माँ बस सुखे में सोने की थी
पर वस्त्राभाव में अक्सर
गीले में ही सोते थे फिर भी
गिले नहीं करते थे
शिकवें करते थे केवल माँ से
माँ आप मुझे सर्दियों में सूखे में
और
आप गीले में

जबकि गर्मियों में
उल्टा
माँ सूखे में
मुझे गीले में सुलाती हो
क्यों ?
कारण कभी नहीं बताया
माँ ने
पर अब मैं समझ गया
माँ का विज्ञान

सिर्दियों मे वस्त्राभाव के चलते
ठंडक से बचाके मां मुझे
सूखे सुला के
स्वयं गीले में सोने का
माँ का शौक नहीं
मजबूरी थी
और
गर्मियों में उल्टा
मुझे नम गिले कपड़ों में
सूला करके
मुझे
गर्म लू (हवा) से बचा करके
माँ खुद
सूखे कपडो में सोया करती थीं

दो दशकों से मैं
माँ को अंर्तमन में
ढूंढ रहा हूँ
जानते हूए कि
इस जहाँ में नहीं है
माँ

कल तो मैंने माँ को
माँ याहू पर.......
माँ मोजिला पर........
माँ सुन्दर पिचई के गुगल पर
माँ को सर्च किया

माँ नहीं मिले गुगल पर भी
माँ ..........................
सुन्दर पिचई ने मैसेज भेजा मुझे
" सॅारी "
माँ गुगल पर सर्च नहीं की जा सकती
माँ का आकार बह्माण्ड से भी
सैकड़ों गुणा बड़ा है
और
माँ कभी मरती नहीं हैं
शिवराम
माँ का ही रूप प्रतिरूप हो
तुम स्वयं
माँ ने अपनी रुह के अंश से
तुम्हारी रूह बनाई
और
जन्म से पहले जब आकारविहिन थे
तुम
कभी द्रव तो कभी सॅालिड रूप में
नौ माह गर्भ में रखा था
माँ ने

बच्चा और माँ एक ही है
तुम माँ भी हो और तुम स्वयं तुम भी हो
माँ से दूर नहीं हो तुम
माँ की धडकन हो तुम।

सादर: शिवराम मीमरोठ
दिनांक: 03.04.17 सोमवार
(घर से स्टेशन की बस यात्रा में)

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