" प्यार कि अपूर्णता "
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प्यार कि पूर्णता
प्यार ही है
वर्ना
दुनिया दे लिए तो
प्यार सदैव ही
अपूरण हैं !
प्यार कभी किसी को
दुनिया कि पूर्णता
नही दे सकता
प्यार तो खुद अपुर्ण है
फिर कैसे देगा दुसरो को
पूर्णता
प्यार के सरे शब्द
अधूरे हैं
प्यार, इश्क, स्नेह, वत्स, प्रेम
और
मोहब्बत
सब शब्दों मैं
इक अक्षर आधा है ,
जब दो सच्चे दिल
सच में मिलते हैं तो
प्यार के
ढाई और ढाई अक्षर
मिलकर
पञ्च अक्षर बनते है
तभी तो प्यार खुद
पूर्णता नही देता
हमे पूर्णता दिल मिला के
हासिल करनी हैं !
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