"होली है जी होली"
-------------------------------------
कहत शिवराम सुनो साथियों
समय कम है हाथ बांटियों
ये होली तो एकदम पोळी हैं,
बताओ कहा सॅालिड हैं होली?
अब जहाँ मे दोस्त मिलते नहीं,
पहले जैसे
जो प्रगति में साथ दे ,
बनके घोड़ा 🐴 - हाथी
विपत्ती के अंधेरे मे राह बताएं
बनके दीपक -बाती ----------
भाइयों, बहनों , मित्रों -सज्जनों,
उल्लझनों में उलझा युँ
शिवराम मीमरोठ
किसके रंग 🎨 लगाये होली में,
आँचल में लगाये या
लगाये किसी की झोली में,
रंग बिरंगे रंगो से ,
आजतलक भरा है ये,
प्रेम रंग से लबालब
ये जीवन पिटारा ----------
कब कब कहां कहां कैसे कैसे ?
किस किसको रंगे ?
कौनसा कौनसा रंग लगाये ?
मन करत है म्हारा,
काँहा की तरह,
अपनी राधा को,
अपने जीवनसाथी को
रंग लगाये हाथों से गालों पर ------
या-----या,,,,,,,,,, या फिर
पिचकारी से,
पिछे से, बाजु से,
छुपके से ,
सीने पे लगाये रंग,
बृज के बाल ग्वालों सा
मगर
पिचकारी से रंग लगाना,
तो लगा ऐसा जैसा कि
रिमोट से टीवी 📺 चलाना --------
या------या---------या
चाहते तो हैं हम भी ,
चाहते तो हैं वो भी हैं
होली के बहाने रंग 🎨 लगाना
अपने मन से उनके मन को
आत्मियता का,
अपनत्व रोग लगाना,
मगर उन पर तो चढ़ा हुआ हैं,
रंग पहले से,
तन पर भौतिकता का,
मन पर स्वार्थवादिता का,
यक्ष प्रश्न तो अभी भी जिन्दा हैं ।
किसके पास बचा हैं रंग
निस्वार्थ स्नेह समर्पण का---------९
रंग मोहब्बत का लगाये,
तो डर लगता हैं,
मोहब्बत तो बढायेगी आसक्ति ,
मोहब्बत में,
तन का तन से मिलन रोक पाये
युवकों के मन में नहीं हैं,
अब वो मर्यदा पालन की शक्ति
सम्भल कर चयन करो,
उन हाथों का,
जो रंग बदल दे गालों का-----
जब जब रंग बिखेरा
मिल बैठे आपस में
रूखे मन से रुखापन का,
तब से अबतलक,
पता नहीं कबतलक
मन की मन से
तन की तन से दूरी रहेगी,
कुछ हुआ नहीं,
मन मंथन से ,
उल्टे चिंतन से चिंतित हुए
फेर बढी वैचारिक ईष्या ----
पवित्र रुह से,
सच्चे मन से ,
पूर्ण समर्पणता से
प्रेम रंग में रंगा हुआ
हिरन मारन राम भगा,
हिरनाकस्प मारन कारण,
खम्ब तोड कर नृसिंहा भया,
प्रहलाद बचा पर होली तो जली,
फिर भीपरन पाप जला नहीं मन का
तन पर झुठा रंग लगाने से--------
यार लगाए यारी का रंग,
माँ बाप लगाये ममता का रंग,
भैया भाभी बहन लगाये,
खुशियों का रंग,
रंग लगाये जीवन नैयाका - जीवनसाथी,
भूले बिसरे दोस्त लगाये
बचपन का रंग --------
अब ना लगाये कोई हमें,
जिस्मानी रंग,
वो बात गई,
वो रात रात गईं,
गैरों के आशियाने मे सजने सँवरने
बिन दुल्हा- दुल्हन बारात गईं सपनों की,
हमरे अरमानों की खेप गई
लावरिश बाजारों में -------
सादर : शिवराम मीमरोठ
From : Shiv Ram Meemroth
No comments:
Post a Comment