वजह तुम हो
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वजह तुम हो, अब तो,
जो हम जी रहे हैं
आँखों से यूँ हम जो पी रहे हैं,
वरना अबतलक तो ,
आँख बंद कर हम प्यासे
प्यास में, प्यासे ही मर जाते ।
प्यास बुझाने ये प्यासा
कुआँ बावड़ी, नदियाँ और दरिया
और सागर तट जा भटका,
प्यास छुपा कर सागर से,
प्यासे ही हम लौटे,
तेरे होठों से कुछ बूंदें स्वाति (अमृत)
पीने को अरमान हमारे दिल में अटके ।
कई दफा हम प्यासे,
प्यास बुझाने चश्मे पर पहुंचे
चश्मा 👓 लगाकर
चश्मे में अर्धनग्न नहाती
परियों को देखा,
चक्षुओं को चेहरा तेहरा
जब पाणी में नजर आया,
हम सूखें होठ प्यासे ही
जीने के लिए प्यासे हीलौटे।
बच्चन की मधुशाला पढ़ कर
पहुंच गये मदिरालय हम
मदिरा से प्यास बुझाने,
पर सांकि की चाल - ढाल
और हाल देखकर
होठों नहीं छु पाये प्याला
तिरछी नजरों से यूँ ही पी आये
हम हाला
और
चल आये हम बच्चन की छोड मधुशाला
अब हर रोज मदिरा पीतो हैं ,
सुर्ख तुम्हारे होठों से ।
सादर : शिवराम मीमरोठ
दि: २५-०३-१७ शनिवार,
प्रात: ५-३० बजे
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वजह तुम हो, अब तो,
जो हम जी रहे हैं
आँखों से यूँ हम जो पी रहे हैं,
वरना अबतलक तो ,
आँख बंद कर हम प्यासे
प्यास में, प्यासे ही मर जाते ।
प्यास बुझाने ये प्यासा
कुआँ बावड़ी, नदियाँ और दरिया
और सागर तट जा भटका,
प्यास छुपा कर सागर से,
प्यासे ही हम लौटे,
तेरे होठों से कुछ बूंदें स्वाति (अमृत)
पीने को अरमान हमारे दिल में अटके ।
कई दफा हम प्यासे,
प्यास बुझाने चश्मे पर पहुंचे
चश्मा 👓 लगाकर
चश्मे में अर्धनग्न नहाती
परियों को देखा,
चक्षुओं को चेहरा तेहरा
जब पाणी में नजर आया,
हम सूखें होठ प्यासे ही
जीने के लिए प्यासे हीलौटे।
बच्चन की मधुशाला पढ़ कर
पहुंच गये मदिरालय हम
मदिरा से प्यास बुझाने,
पर सांकि की चाल - ढाल
और हाल देखकर
होठों नहीं छु पाये प्याला
तिरछी नजरों से यूँ ही पी आये
हम हाला
और
चल आये हम बच्चन की छोड मधुशाला
अब हर रोज मदिरा पीतो हैं ,
सुर्ख तुम्हारे होठों से ।
सादर : शिवराम मीमरोठ
दि: २५-०३-१७ शनिवार,
प्रात: ५-३० बजे
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