Sunday, 5 January 2020

" जबतलक थे हम माँ के पेट में " -

" जबतलक थे हम माँ के पेट में "
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जन्म-पुनर्जन्म का प्रमाण नहीं
भगवन का भी पता मालूम नहीं
मगर जबतलक थे हम माँ के पेट में
बह्माण्ड में सबसे मंहगे थे प्यार की रेट में
इक इक पल पल गिन गिन कर
नौ माह का वक्त गुजारा था गर्भ में
उन दिनों धडकन जुड़ी हुई थीं हमरी
माँ की धडकनों के साथ में ।
जन्मते समय दोनो मुट्ठी बंद कर ली थी
कुछ साथ लाने की लालच में
बुद्धि विद्या कौशल और
धन दौलत और महलो की चाबी
कुछ भी तो नहीं ला पाये हाथ में ।
बंद मुठ्ठी हाथ खाली लेके
रोते हुए आ गये हम तेरे संसार में
आपने बिन जाने मेरी अर्जी मुझे
क्यों ?
नाम दिया आपने अपनी पसन्द का
नादान मैं इतना था की
सोचता क्या, बोलना तक आता नही
और
आपने आपनी मर्जी से सरनेम आपका
जातपांत और धर्म आपका
क्यों जोड दिये मेरे नसीब में
मैं पूछता हूँ तुझसे ऐ मेरे खुदा
क्यों बुना जात-पांत और धर्म का
ये जाल फर्जी फासने हमको
बिन जाने मेरी अर्जी
किसने दिया ये हक़ तुझको
बचपन, जवानी और बुढ़ापा आया
खाए, खेले, सुस्तायें और सोये
वक्त पर बुलावा जब भी आयेंगा
तब हम मुठ्ठी खोलके जांयेंगे
देख लेना कुछ भी साथ में नहीं ले जांएगे.
सादर: शिव राम मीमरोठ

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