Sunday, 2 August 2020
Monday, 27 July 2020
Nothing is Impossible | Success Tips through Sonu Sharma | For Associati...
Nothing is Impossible | Success Tips through Sonu Sharma | For Associati...
Friday, 24 April 2020
Happy Birth day of Ho'ble Sir
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सौभाग्यवती यामिनी है
बादलों में नहीं धरा के दामन में दामनी हैं
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सादर
: शिवराम
मीमरोठ
Wednesday, 22 April 2020
Mewar State Logo : Punja Bheel RANA
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Saturday, 18 April 2020
आखिर कोरोना आया क्यो?
कृष्ण - अर्जुन सम्वाद
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भगवान कृष्ण बोले ;
हे पार्थ! तुम्हें गीता उपदेश में जो कुछ संशय रह गया ऊसे अब दूर करता हु।
अर्जुन: कैसे भगवान ?
भगवान कृष्ण : गीता में तुमने चतुर्भुज रूप देखा था, उसमे भी सब मेरे में ही समा रहे थे और मेरे से ही जन्म रहे थे। जो तेरे सिवाय केवल संजय ने ही देखा था, शेष जन दर्शन से वँचित रह गए थे।
अर्जुन : हा ! माधव वो तो हैं।
कृष्ण; अब तू प्रकृति का अतिशुक्ष्म - सुप्रीमो रूप भी देखो।
गूढकेश; हे ! बंसीधर ,
ये क्या है ।
ये तो कोरोना है।
ऋषिकेश: सुन पृथापुत्र ,
ये कोरोना ही कलयुग में सुप्रीमो पावर हैं,
यही तो प्रकृति शक्ति का अतिसूक्ष्म अवतार है । जो छोटे-बड़े का , अगड़े-पिछडो का, गरीब-अमीर का, काले-गोरो का, आस्तिक-नास्तिक का, शाकाहारी-मांसाहारी, साहिब -नौकर का, धनकुबेरों-फकीरों का, सतर्क-आलसियों का,
नर-नारी का , स्वगींन-विधवा का, वर्जिनिटी-वैश्यों का, मालकिन -दासियों का इत्यादि, सबका फर्क मिटाने / भ्रम तोड़ने पुनः कोई आगाज हुआ है।
जब जब पृथ्वी पर भार बढ़ेगा , तब तब प्रकृति शक्ति अलग अलग रूप में आती रहती हैं ।
अर्जुन: हे , भगवान , ये शक्तिया तो भारत मे ही जन्म लेती है । फिर इसबार चीन में कैसे पहुच गए।
राधेश्याम; है, अर्जुन ! फहले भी भारत मे नही पहले महाभारत में अवतरित हुई थी सुप्रीम पावर । जिसमे , कभी अयोध्य्या, कभी कैलाश पर्वत , कभी इंद्रप्रस्थ, , हस्तिनापुर , अफ़ग़ानितन, गन्धार(गन्धारी) व चीन भी शामिल था, जिसे आर्यव्रत भी कहते थे।
अर्जुन : तो फिर आप राधा व द्रोपदी के बारे में भी बताओ।
कृष्ण: सुनो द्रोण शिष्य! अब न तो राधा सुरक्षित हैं और न ही द्रोपदी।
अर्जुन: कैसे भगवन?
कृष्ण; तुम भूल गए अर्जुन। मथुरा से द्वारका जाते समय , मेने राधा से वादा किया था कि कलयुग में हम असंख्य प्रेमी युगलों के की आत्मा में वास करेंगे।
अर्जुन: तो फिर । करो प्रेमियों के दिल मे वास।
कृष्ण : राधाओ का हाल तो देखो अर्जुन !
तुम नही जानते क्या क्या हुआ था:
निर्भय व छपाक के साथ?
अनजान मत बनो।
अब दुनिया के
शिशुपाल , जयद्रथ, कंस मामा, सकुनी मामा, दुर्योधन,बरावण इत्यादि कब तक बचेगे जो अबलाओं का दमन हरण करने के लिए एक कदम भी नही रुकते।
अर्जुन : समझ गया भगवन।
परन्तु द्रौपदी तो सकुशल ही हैं मुरारी।
कृष्ण: झूठ !अर्जुन , सरासर झूठ।
पहले तो
एक एक ही दुर्योधन , धूर्तराष्ट , गन्धारी , द्रोण, भीष्म व कर्ण थे
अरजुन : थे तो एक एक ही भगवन।
कृष्ण : अब तो घर / होटल के हर कमरे में एक दुर्योधन , हर घर मे एक धूर्तराष्ट,
हर न्यायलय में आँखों पर पट्टी बंधे गन्धारी(जानबूझ कर) ,
हर भर्ती बोर्ड में द्रोण- एकलव्य के लिये,
हर आफिस में ख़ुर्शी से बंधा भीष्म ,
और कचरे के डिब्बे में - झाड़ियों में अनगनित कर्ण पड़े मिलते बहैं !
है ! अर्जुन ,
आंखे तो खोलो और देखो तो सही।
कृष्ण; रही बात पार्थ द्रोपदी की तो सुन:
पहले द्रोपदी की साड़ी की लंबाई अनन्त थी । उसकी तुलना में पाताल से आकाश तक की दूरी भी कम थी । यह बात पांडव नही समझ पाए तो क्या ?
राजकुमार दुशाशन-दुर्योधन तो जान ही गए थे।
और अब तो हर अबला द्रोपदी नग्न एकदम नग्न है।
किसी के पास ब्रा- पेंटी नही हैं तो किसी के पास चुन्नी नही हैं। ( सन्दर्भ: पब, नाईट बार , डिस्को पार्टी)
साड़ी तो अब इंद्रधनुष की तरह ईद का चांद बन हुई हैं।
तभी तो हर रावण/ दुर्योधन के हौसले बढ़े हुए है।
अर्जुन : है, भगवान ! क्या सच मे द्रोपदी की साड़ी जमीन से आसमान तक लम्बी थी।
कृष्ण; सच जानना चाहते हो अर्जुन !
तो सुनो।
तुम पांडवो ने और भुआ कुंती ने छल किया था द्रोपदी के साथ ,
तुम सब दुर्योधन समदोषी हो, पार्थ।
अर्जुन : नही नही नही।
कृष्ण: गांडीवसे तुच्छ खिलोने से खेलने वाले बालक हो तुम ।
सुनो ,
तुम्हें केवल महाभारत देखा था ।
असल खेल तो न तुमने देखा और नही सुना ।
अर्जुन: वो क्या है
कुंजविहारी , जो मेने आज तक नही जाना ।
अपने गीता सिर्फ मुझे सुनाई ।
मैं सखा हु, आपका फिर अपने मुझसे छुपा के कोनसा खेल रखा और किसको बताने के लिए रखा ?
अर्जुन : नंदलाल ! आज तो बता दे।
कृष्ण: छोड़ो! अर्जुन , कोई खास नही।
अर्जुन : भगवन, मानाकी मेरा गांडीव एक खिलौना था ।
महाभारत में कर्ण- भीष्म सम योद्धाओ का हन्ता भी तो गांडीव ही था।
तो फिर वो खेल कौनसा था जो किसीने नही देखा ?
बताओ बताओ,,,,,,
कृष्ण: ऐसा तो नही की किसी ने नही देखा।
हाँ ! द्रोपदी ने देखातो था वो खेल !
जो अक्सर पंडवो के शयनकक्ष चलता था।
अर्जुन: है भगवान । क्या पहेली बुझा रहे हो।
मेरे शयनकक्ष में खेल और मुझे पता नही।
मै , नीरा मूर्ख था क्या ?
वाशुदेव !
मेरा शयनकक्ष जलील हुआ।
मेरा भूतकाल रो रहा हैं ,
मेरा वर्तमान पश्चताप की अग्नि में जल रहा हैं।
मेरे द्रोपदी से खेल।
अर्जुन: राधाउरवासी !
मेरी जिगयहास शान्त करो।
द्वारकाधीश: सुन अर्जुन।
(१)सच कहु तो गांडीव एक खिलौना था ।
कृष्ण ; जब श्रीराम ने परमप्रिय सीता के स्वयंबर में जिस शिवधनिष को तोड़ा था ।
, दो टुकड़ों में टूट शिव धनुष ।
उसके प्रथम : टुकड़े से गांडीव बना था और
दूसरे टुकड़े से कर्ण का धनुष बना था (परन्तु शिवधनुष की मूल प्रत्नच्या कर्ण की धुनष पर बंधी थी इस लिए कर्ण, अर्जुन से बड़ा महारथी धनुधर था)
(२) आगे सुनो अर्जुन!
तुमने मछली की आंख फोड़ के द्रोपदी का स्वंबर जीत था तो क्या कमाल कर दिया था?
तुम पांडवो
ने तो द्रोपदी को भी दोनों आँखों की अंधी समझ लिया था , जिसको बुआ के कहने पर पांचो भाई बांटने लगें।
और द्रोपदी ने व्याकुल हो कर मुझे स्मरण किया , मदद मांगी।
और कहा कि
हे केशव !
मै पांच पांच पतियों का वरण नही कर सकती ,
मेरे साथ धोखहुआ हैं।
मुझे जीवन से मुक्ति चाहिए।
मैने,
द्रौपदी को उसी क्षण वरदान दिया था कि द्रोपदी तुम्हरे साथ अन्याय नही होगा।
याद करो , जब पूर्व जन्म (सीता) में रावण तेरे वस्त्रों को नही छू पाया!
तो यज्ञसेनी (द्रोपदी) मेरा वादा हैं कि इस जन्म में सृष्टि के समस्त मानव -दानव मिलकरके भी तुम्हारे आवरण हटा करके तुम्हें अनावरण (निवस्त्र) नही कर पायेंगे।
तुम अब लम्बे समय तक जाओ पुनः अग्नि में वास करो ( जरूरत होने पर लाक्षागृह में इन पुतलो को अग्नि से बचना)
और
तुम्हारी परछाई को
ये पांचो पुतले (पांडव) पत्नी मानके खुश होते रहेंगे और परछाई से वंशवृद्धि भी हो सकेगी।
आगे सुनो अर्जुन,
कोई भी नर दानव
को द्रोपदी के वस्त्रों तो थाह ही नही पा सकते, तो फिर भला पांडवसंग पति-पत्नी का धर्म का पालन कैसे निभता।
सुनो अर्जुन!
आप लोगो के साथ द्रोपदी केवल
तीन दिन ही रही थी
(क) राजा जनक के दरबार में स्वंबर के समय जनक सुता के रूप में ।
(ख) कौरव की राजसभा मे चीर हरण की समय आर्यावर्त की वधु के रूप में।
(ग) लाक्षागृह में अग्नि से पांडवो को बचाने याज्ञसेनी के रूप में ।
नॉट:
सुनो अर्जुन!
, सीता जनक के खेत मे पैदा हुई, फिर अग्नि परीक्षा, अंत मे अयोधया में धरती में समा गई (राम के शक करने पर) और उसने प्रतिज्ञा ली कि अब किसी भी धोखेबाज पुरुष का वरण नही करूंगी) और राजा
द्रौपद के यज्ञ में अग्नि से पैदा हुई कि थी ताकि अब कोई अग्नि परीक्षा नही देनी पड़े), लेकिन फिर पांडवो ने धोखा दिया कि एक सती औरत को मजबूरन पांच पति, थोपे ते उस पर।
अर्जुन : धन्य हो ! रुक्मणिशैया , राधवल्लभ।
परन्तु मुझ भेद क्यो।
कृष्ण ; हाँ !
गीता अर्जुन को बताई शेष खेल द्रोपदी को बताया।
कृष्ण : सुन ! अर्जुन , में ही कोरोना हु।
देख मेरा शुक्ष्म रूप हैं कोरोना अब तू और मत रोना
चतुर्भुज रूप तो बहुत देखा था महाभारत में।
अर्जुन ; है केशव@ कोरोना से बचाव ?
कृष्ण; महाभारत में अश्वस्थामा ने जब नारायण अस्त्र चलाया था तो कृष्ण ने कहा कि हथियार डाल के यथावत खड़े रहो , उसी प्रकार कोरोना से बचने के लिए अर्जुन तुम घर मे यथवत रहो।
सादर ; शिव राम मीमरोठ
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