Thursday, 17 October 2024
Saturday, 12 October 2024
मौन का मौन संवाद
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बोलते ही शब्द वजन छीन लेते है मनभावों से
मौन में मौन का, प्रेम का संवाद हुआ आंखों से
मिलने से भला जो होगा बिन मिले महसूस करू
वो भी तो डरते है खुदा, खुदा की तरह मिलने से
भीड़ में खोजते उन्हे खुदा,अपने परायों में देखते
दिल मान गया प्रेम में, वो बच गए दिल लगाने से
नाम कोई लेवे उनका , हम पीछे मुड़के देखते
कंखिया त्योरियां नजरे उन्हें देखती पलकों से
प्रेम युद्ध में अहसास_भावना बहे अश्कों में
वो जीत जाए जंग, हमें खुशी प्रेम में हारने से
खोने पाने के अहसास समरस हुए अब मेरे
दिल ऐसा लगा गौतम बुद्ध का आम्रपाली से
छुआ नहीं आंखों ने जिस्म,वक्ष अधर अतके
गीता कहे प्रेम निष्काम करे जिस्म या रूह से
प्रेम में विश्वास हो तो अच्छे वर्ना विषवास होगा
हम वन चले,नो में से तीन गए,सीता कहे राम से
प्रेम में भीगे मन प्रेमी का, प्रेम तन भिगोता नही
प्रेम की वर्षा में हो खुदा, हमें परहेज नहीं नहाने से
प्रेम में जिव्हा खामोश, अधर सिले हुए शून्य में
सांसों ने महसूस किया प्रेम, आंखो के कहने से
सादर: शिव राम मीमरोठ
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अभी से वो नजरफेर हो गए
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एक सी सोच रही एक सा ख्याल एक सा स्वप्न रहा
पहले अलग अलग दो जिस्म थे फिर एक रुह हो गए
पास बैठे बतियाने निस्वाशों की गर्म हवा स्वास बने
निस्वासों से हवा ले फेफड़े दिल के और पास हो गए
छूते नही उन्हे,बिजली है वो,उन्हे छूने से लगे करेंट
बिन छुए बिन चखे लव में लब उनके लजीज हो गए
उन्हें नही पता उनकी परछाई भी दिल अजीज है
वजह कुछ, ठोस रही होगी जो वो हरजाई हों गए
हमें देख भौंहे तिरछी करी और नाक सुकेड़ी क्यों
होठ वक्र हुए उनके ठोडी तक हम अजनबी हो गए
उन्हे पूजा ह्रदय में मैंने समझ कभी लैला कभी राधा
मन मैला हुआ मेरा दिल तोड़ के वो गुनहगार हो गए
कई मर्तबा दिल तोडा,दिल मेरा कमबख्त जुड़ गया
मुंह मोड़ भी लेंगे वो, कभी अभी से नजरफेर हो गए
उनकी कातिल नजर से निगाह में जकड़ा रहा दिल
बिन पंख बिन उड़े वो मेरी दुनिया से फरार हो गए
पहले इश्क में दर्द कम था जब प्यार उनका दवा था
अब दवा सहित औषधालय से वो वैध हवा हो गए
सादर : शिव राम मीमरोठ दुर्गेश
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आम्रपाली
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दिल करता उनसे कुछ कहना, मगर कभी नही कहना
अंतर्मन मे उनकी बाते भर कर मन ही मन खुश रहना
मिलते नही वो दिखते नही वो फिर भी मेरे दिल में रहते
ये दिल उनका,वो मालिक इसदिल के उन्हे दिल में रहना
मिलना नही मुनासिब नसीब में कई बातें उनसे कहने को
उन्हे याद करे या उन्हें भूले,फिर भी दुविधा में खुश रहना
मन खुद्दारी करे किसी से दिल गद्दारी कैसे करे उसी से
मेरा मन मेरा दिल मुझे इनके और उनके चंगुल में रहना
ये प्यार वगैरा क्या होता है करते क्यों हैं लोग मोहब्ब्त
जिसने आंखें चार करी उसे होठों से प्यार में प्यास रहना
धर्म से हिंदू कर्म से बौद्ध हूं मैं, पर पूर्ण बुद्ध बना नही
अब चाहें बनू बौद्ध भिक्षु मुझे तो आम्रपाली संग रहना
सादर: शिव राम मीमरोठ
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9Kc Sharma, Piara Singh and 7 othersकच्चा रंग होली का Vs पक्का रंग जाति धर्म का
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होली का कच्चा रंग रंगे छोटी होली बड़ी होली धुलंडी सा
रंग सदा रहा उर्वशी सा आम्रपाली सा, सन्नी लियोनी सा
शादी में रंग हल्दी का फीका पक्का रंग जात धर्म का
दहेज रंगे शादी का ताना बाना संबंध कबूतर बाज सा
शादी परिवार वंश समाज रंग की सीढी देखे घोड़ा चढ़े
रंग जात देखे बिन फरेबी फरेब करें एकांतमें यमराज सा
कौनसे रंग में रंगा जिस्म रंगीन लगे सुनसान में एकांत में
जिस्म क्यों ना रंगा हल्दी के रंग में रंगरेज था अंग्रेज सा
होठ लाल रंग के झूठे किए एक तस्तरी में एक चमचे से
स्त्री से सांसे रंगीन करे शादी जांच जात धर्म लिटमस सा
रंग आड़े कौनसा आया, समरूप कृत्य में सजा में अंतर
रंग जो रंगे पुलिस का डंडा वो फर्क करे चोर से धंधा सा
सादर : शिव राम मीमरोठ
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नींद ख्वाब सोना
जब चाह में मिरा तकिया का नाम
यूं ही हमने तिरा नाम पे रख दिया
मिरा तकिया मिरा दोस्त बन गया
भाव जो खाते थे नजर जो फेरते थे
हमे यतीम समझ के कहते थे उनका
दिल लॉकर में रखा छोडा ऐसा कहते
तेरे नाम से तकिए ने जख्म सही दिया
तुनामी तकिएसंग ख्वाबों में होता हूं
तिरी नीली आंखो में चेहरा खुद का
शुरू से नींद में दिखा तो करता था
इश्कसे पहले आंखों ने धोखा दिया
दोष किस की आंखो में था पता नही
आइने में मेरी आंखे तुझे खोजती रही
तिरे बगल में तिरी सहेली दिखती थी
तकिए से खफा आइने ने यूं धोखा दिया
तुनामी तकिया ज्यादा मुलायम यूं हुआ
या मेरे ही दिल को लगता तिरे नाम संग
मैने थोड़ा सा भी कुछ तुझसे नही लिया
मजा तिरे नाम के तकिए ने ज्यादा दिया
बाहों में सिमटता तिरे नाम का ये तकिया ,
मुझे अच्छा लगता तिरा नाम का ये तकिया
तकिए ने जंघाओं के आलिंगन में दुबक के
तिरे होने का अहसास कल ताजा कर दिया
तुनामी तकिया शिकायत मुझसे करे तिरि
मुझे नाचीज़ कहे और तुझे सब चीज कहे
ग्रीवा पसरी तो थी तकिए पर तुम्हारी भी
फिर तकिए ने आरोप मुझ पर लगा दिया
कैसे छुडाऊ पीछा तिरे नाम के तकिए से
तकिए में तुम हो या तुम ही खुद तकिया हो
मेरी जिंदगी में तिरे नाम तकिए ने मेरे लिए
तिरे नाम के तकिया को कलाम बना दिया।
सादर : शिव राम मीमरोठ
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बुद्धम शरणं गच्छामि
जुड़े तो थे कभी शिव स्वयं शक्ति से
जुड़ाव आत्मिक निराकार भक्ति से
मर्यादा नीति तज,अनीति तकी नही
दुराव नियति में गौरी पार्वती दुर्गा से
जो होना था वैसा नही हुआ कुछ भी
प्रेम यात्रा जारी फिर हुई दोस्ती उससे
बंधन में बंधना कितना जरुरी, वर्ना
गोपियों संग कान्हा उड़े पूंछलो राधा से
रुक्मणि तो रुक गई अपने आंगन में
कान्हा का दिल जा लगा उस राधा से
फितरत्ती ने फितरत में भगवान भी बदले
शिव छोड़ कृष्ण जपा अब मन लगा बुद्ध से
प्रेम अमर है फिर क्यों काया बदले चाहत
उम्र ढली,दिल ढला और जा जुड़ा किसी से
स्वपन में चलु नींद में चलू तुम्हे ढूंढने को
एक बार कहदो बुद्धम शरणं गच्छामि से
तरफ देखलो मेरी या देखू तरफ तुम्हारी
प्रेम हमरा इकतरफा क्यू होगा अब उनसे
ना मिलते हो तो अच्छा लगता दिन मुझको
मिलते ही लगता खुलकर मिला नही उनसे
सादर : शिव राम मीमरोठ
@Copy right reserve
माना की संग दिल हूं !
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कब्ज होने से पहले प्रेमिका की नब्ज़ देखना पहला प्रेम है
एक ने निरस्त किया दो से जताने पूर्व निरस्तीकरण ही आखरी प्रेम है
इशारे समझा, वैरागी समझना,वैराग धर्म मेरा उनसे आखरी प्रेम है
कौनसी भूल हुई जो उनके मर्म के मूल में पहुंच गए हम भूल से
मन पढ़ना उनका कोई पहेली नही समझ में आ गया
ये आखरी प्रेम है
समझना इतना भी कठिन नही किसी के मन को जो केमिस्ट्री से आसान है
उन्हे छोड़ने के बाद इन्हे जताने से पहले इनका इनकार आखरी प्रेम है
माना की संग दिल
हूं , उनका असंग, संग दिल पर लकीर सी है
जताने से पहले बिन बताएं उनका इनकार श्रष्टि से मेरा आखरी प्रेम है
मान लिया, पीछा छोड़ दिया हवा का अब सहारा केवल दावा का,
पेड़ से सूखे तिनके चुन घरौंदा बुन पक्षी ने जताया आखरी प्रेम है
सादर: शिव राम मीमरो
कटे नाखून टूटे बाल तलक सहेज
क्यू प्यासे को दशकों से सागर तट पर मिलने बुलाया
क्या गगरी खाली थी या रीति थी जो नीर नही पिलाया
या नियत काली थी या फिर मजबूर मुस्कान क्यों थी
जब प्रतिस्पर्धी गिरगिट से हो, फिर भला क्यों फितरत से
भोले प्राणियों से छलाव कर दिल का पर्दा क्यों हिलाया।
समय रहते भान हुआ उनके फितराती मधुर मिजाज का
वर्ना हम धोबी का कुत्ता घर का,न घाट का, ऐसा भुलाया
चलो फिर और कही रिहर्सल, नेट प्रैक्टिस नही करना
हमारे दिल की पिच पर पग चिन्ह उनके नही धुलाया
चलो फिर नही मिले कभी दिन में,रात में ग्रहण की तरह
कैंडल नाइट डिनर पर न कभी बुलाया न पास में सुलाया
कुछ तो मर्यादा लेखन में है वर्ना वो तो मर्यादा भूल गए
कटे नाखून टूटे बाल सहेजे पर नसीब ने नही मिलाया
*हैप्पी फ्रेंडशिप डे*
आँखों के रास्तें अनमोल रिश्ता दोस्तीं का हम ख़ुद के लिए ख़ुद बनाते है।
अनमोल दोस्ती तोड़के, ख़ुद के लिए ख़ुद जन्नत के दरवाज़े बंद करते है।।
होठों से बातें हो नहीं पाती, आँखों से आँखें बातें करती पहली मुलाक़ात में ।
नथुनें उमस उगले, साँसों की गर्मी से चक्रवात उठे,लहू रगों में लाए सुनामी
आँखों से गंगा_जमना निकले दिल सागर उझले पलकें झुक मंगल करते।।
पहले रुकते,धीरज रखते थे, ईद दिवाली होली का और फागुन के फाग का
तीज त्यौहारों,सावन के झूलों, बैशाखी के मेले तक दिल सब्र तोड़ते रहते है।।
अब तो ढूँढ लिए जाएँगे यूँ फ़ोन नंबर, गूगल अकाउंट, अल्फ़ाबेटिक नाम से
अब यू-ट्यूब फ़ेसबुक ह्वाट्सऐप ट्विटर इंस्टाग्राम लिंक्डइन से लिंक रहते है।।
नाखूनरी नैल पॉलिस, हिना अंजलि लालिम,गर्दनरी सलवटे, भालरी लकीरें
पहले देखा करते थे, अब इंतज़ार कों नहीं करे, अब सीधा आलिंगन करते है।
मुझे पता क्या? क्या तुम पढ़ने की पहल करोगें? या फिर एक और भूल करेंगे!
कह नहीं पाये दिल दशकों में सदियों के क़िस्से दिल से वो बात पते की लिखते है।।
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सादर : S R Meemroth
पर वो बात नहीं माँ इन उँगली में
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ऐ ओ सुन मेरे खुदा
मुझे एक और ज़िंदगी दे,
ये भी कोई जीवन है
ये भी कोई जीवन है
मैं साथ रहूँ हर पल उनके
वो साथ रहे हर क्षण हमके
जीवन जी लेवे मिलकर खुलके
कहीं किसी और पे हुआ नहीं
ये मेरा दिल फ़िदा ए ओ मेरे खुदा
मुझे अब , उनसे मिलने को
ऐ मेरे खुदा मुझे एक और ज़िंदगी दे।।
मेरी ये जीवन यूँ ही बीता,
जीवन बीता ख़ाली शून्य में रीता सा
ना तो मिली कोई सीता सी
ना मिला उपदेश कोई गीता सा
क्यों और ख़राबी मैं जिलु मैं
क्या बन के शराबी पी लूँ मैं
अब तू ही वजह बता जीने की
वरना वरना नहीं तो नहीं तो
मुझे अब , उनसे मिलने को
ऐ मेरे खुदा मुझे एक और ज़िंदगी दे।।
एक ऐसा जीवन दे जिसमें ना हो
माँ मेरी मुझसे जुदा
कुछ दिन खेला कूदा मस्ती में
माँ तेरे आँचल में उसी पुरानी बस्ती में
मेरा जिस्म ढला जिसके जिस्म के साँचे में
उनसे मिला दे रे उनको बुला दे रे
नवम्बर नहीं दिसंबर नहीं
माँ से जुदाई का महीना सितंबर था
सितंबर ने सितम ढाएँ
उनसे मिला दे रे उनको बुला दे रे
या कहदे मिलना भी तो संभव नहीं
नहीं तो नहीं तो
मुझे अब , उनसे मिलने को
ऐ मेरे खुदा मुझे एक और ज़िंदगी दे।।
क्या बुरा किया मैंने बचपन में
जो माँ की उँगली छूट गई,
बाद में तेरे माँ मेरी माँ
उँगली तो ललनाओं की बहुतेरी पकड़ी
और पकडली उँगली बहूँ तेरी की
पर वो बात नहीं माँ इन उँगली में
जो बात मिली माँ मेरी तेरी उँगली में,
जब याद करूँ मेरी माँ तुझको
मेरी आँखों में पानी भर आये
उँगली पकड़ कर चलना सिखाया
चलना ही नहीं,उँगली पकड़ खाना सिखाया
जननी का जब से साथ नहीं
जीवन में अब वो बात नहीं
मुझे अब , उनसे मिलने को
ऐ मेरे खुदा मुझे एक और ज़िंदगी दे।।
मेरा जीवन वही था जो माँ सैंग जिया
मेरी लिए गीता वही है जो वो कह गये
जाने के बाद तुम्हारे माँ
कैसी दिवाली,कैसी होली
उस दिन बाद नहीं मन से खेली
अब निकले चाहे किसी की डोली
मुझे लगती हर चीज क्यों भोली
पर मुझे याद है मेरी माँ,
जो जाते जाते तू माँ मुझे बोली
मुझे अब , उनसे मिलने को
ऐ मेरे खुदा मुझे एक और ज़िंदगी दे।।
@कॉपी राइट रिज़र्व
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