बुद्धम शरणं गच्छामि
जुड़े तो थे कभी शिव स्वयं शक्ति से
जुड़ाव आत्मिक निराकार भक्ति से
मर्यादा नीति तज,अनीति तकी नही
दुराव नियति में गौरी पार्वती दुर्गा से
जो होना था वैसा नही हुआ कुछ भी
प्रेम यात्रा जारी फिर हुई दोस्ती उससे
बंधन में बंधना कितना जरुरी, वर्ना
गोपियों संग कान्हा उड़े पूंछलो राधा से
रुक्मणि तो रुक गई अपने आंगन में
कान्हा का दिल जा लगा उस राधा से
फितरत्ती ने फितरत में भगवान भी बदले
शिव छोड़ कृष्ण जपा अब मन लगा बुद्ध से
प्रेम अमर है फिर क्यों काया बदले चाहत
उम्र ढली,दिल ढला और जा जुड़ा किसी से
स्वपन में चलु नींद में चलू तुम्हे ढूंढने को
एक बार कहदो बुद्धम शरणं गच्छामि से
तरफ देखलो मेरी या देखू तरफ तुम्हारी
प्रेम हमरा इकतरफा क्यू होगा अब उनसे
ना मिलते हो तो अच्छा लगता दिन मुझको
मिलते ही लगता खुलकर मिला नही उनसे
सादर : शिव राम मीमरोठ
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