इस कदर परेशान हैं,
कराहाता हैं उपेक्षा के जख्मों से !
स्वास लेना, पलके झपकना तो
दूर की कौड़ी हैं
उल्टा करके, सीधा करके
उल्टके, पलटके, आगेसे, पिछेसे
ठूँस देते हैं आटोमेटिक प्रिंटर में
लेजरबीम जलाती है तन बदन को
अक्सर !
साहिब की टेबल पर
दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या !
कागज बेचारा इतना भी ना जाने,
कब दस्खत होंगे साहिब के
मूक-बधिर-सूरदास कागज क्या जाने ?
साहिब दस्खत करदेंगे !
!! तो !!
लाइफ मिलेगी फ़ाइल में
वर्ना पड़ा रहेगा डस्टबीन के पाइल में
अक्सर !
साहिब की टेबल पर दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या ।
कभी दीवान- ए-खास में,
कभी दीवाने आ-आम में,
बादशाहत की चकाचौंध में
नवरत्नों- बीरबल्स-टोडर्मल्स
की चौखट पर ,
बदतर से बदतर लाइफ होती हैं
बेकसूर !
उन कागजो की
जिनका कसूर इतनासा हैं
वो हैं सृजनकर्ता दफ्तर के,
वो हैं दामनिकृति दफ्तर के
वो है भूले-बिसरे पीएसयू ,
राईटस -रॉन्ग दफ्तर के ,
कागज मूक-बधिर-सूरदास क्या जाने ?
लाइफ मिलेगी फ़ाइल में
पड़ा रहेगा डस्टबीन के पाइल में
अक्सर!
साहिब की टेबल पर दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या !
सादर: शिव राम मीमरोठ