Tuesday, 18 February 2020

बेकसूर दफ्तरी कागजों का दर्द!

दफ्तरी कागज दर्द से , पीड़ा से 
इस कदर परेशान हैं,
कराहाता हैं उपेक्षा के जख्मों से !
स्वास लेना, पलके झपकना तो 
दूर की कौड़ी हैं
उल्टा करके, सीधा करके 
उल्टके, पलटके, आगेसे, पिछेसे
ठूँस देते हैं आटोमेटिक प्रिंटर में
लेजरबीम जलाती है तन बदन को
अक्सर !
साहिब की टेबल पर
दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या !

कागज बेचारा इतना भी ना जाने, 
कब दस्खत होंगे साहिब के
 मूक-बधिर-सूरदास कागज क्या जाने ?
साहिब दस्खत करदेंगे !
!!  तो  !!
 लाइफ मिलेगी फ़ाइल में 
वर्ना पड़ा रहेगा डस्टबीन के पाइल में
अक्सर !
साहिब की टेबल पर  दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या ।

कभी दीवान- ए-खास में,
कभी दीवाने आ-आम में,
बादशाहत की  चकाचौंध में
नवरत्नों- बीरबल्स-टोडर्मल्स
की चौखट पर ,
बदतर से बदतर लाइफ होती हैं
बेकसूर !
 उन कागजो की
जिनका कसूर इतनासा हैं 
वो हैं सृजनकर्ता दफ्तर के, 
वो हैं दामनिकृति दफ्तर के
वो है भूले-बिसरे पीएसयू , 
राईटस -रॉन्ग दफ्तर के ,
कागज मूक-बधिर-सूरदास क्या जाने ?
लाइफ मिलेगी फ़ाइल में 
 पड़ा रहेगा डस्टबीन के पाइल में
अक्सर!
साहिब की टेबल पर दम तोड़ती हैं
कागज की जीवनप्रत्नच्या !

सादर: शिव राम मीमरोठ

 





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