Saturday, 12 October 2024

 कटे नाखून टूटे बाल तलक सहेज

क्यू प्यासे को दशकों से सागर तट पर मिलने बुलाया
क्या गगरी खाली थी या रीति थी जो नीर नही पिलाया
या नियत काली थी या फिर मजबूर मुस्कान क्यों थी
या दुराव इरादों में था,स्वासों में निस्वास क्यों मिलाया
जब प्रतिस्पर्धी गिरगिट से हो, फिर भला क्यों फितरत से
भोले प्राणियों से छलाव कर दिल का पर्दा क्यों हिलाया।
समय रहते भान हुआ उनके फितराती मधुर मिजाज का
वर्ना हम धोबी का कुत्ता घर का,न घाट का, ऐसा भुलाया
चलो फिर और कही रिहर्सल, नेट प्रैक्टिस नही करना
हमारे दिल की पिच पर पग चिन्ह उनके नही धुलाया
चलो फिर नही मिले कभी दिन में,रात में ग्रहण की तरह
कैंडल नाइट डिनर पर न कभी बुलाया न पास में सुलाया
कुछ तो मर्यादा लेखन में है वर्ना वो तो मर्यादा भूल गए
कटे नाखून टूटे बाल सहेजे पर नसीब ने नही मिलाया

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