दर पर उनके सलामत रही आबरू
दर्द नज्म बना जब लोटे बेरूबरू।
ख्यालों में जो हमारे सदा सिरमौर रहे
सपनों में तो आए यही हमारी आरजू।
झिझक हमारी हमको झिड़के वर्ना
दिल चाही उनके अंक में दिन भर रहूं।
जादू वाणी में या निगाहों या अदाओं में
भूलने से पहले नाम फिर गुनगुनाऊं ।
कैमिकल लोचा हुआ विचारों में कुछ यूं
विस्मरण से पहले फिर से स्मरण करू।
सादर : शिव राम मीमरोठ
@कॉपी राइट रिजर्व
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