Monday, 18 March 2024

साइकिल

कक्षा 9वीं में मुझे दी थी पिताजी ने खरीदकर साइकिल साइकिल पुरानी जान से प्यारी वो दिल को अजीज थी

पहला प्रेम पहला इश्क पहली मोहब्बत हुई साइकिल से , स्कूल पैदल जाते साइकिल पाने की इच्छा अजीब थी
साइकिल का सपना साकार हुआ पैरों को जूते मिले नही
चप्पल पहन साइकिल चलाते थे मालीहालत गरीब थी
फ्रेम टूटा हुआ वेल्डिंग से जुड़ा फिर भी मन को भाया था
टायर घिसे हुए पंचर बनी हुई वो मेरे दिल के करीब थी
ब्रेक एक ही लगता था फिर भी टक्कर नही होती थी
मै उसका मालिक था, फिर मुझे लगा,वो मेरा नसीब थी
शौक से चलाते थे चाव में दौड़ाते थे हवाई जहाज बनाते
हर रोज स्कूल जाते वा आते चैन उसकी खूब उतरती थी
चैन उतरने पर भी खेत दो खेत पगडंडी पर भी दौड़ती
पगडंडी में मैड या चढ़ाव में बिन चैन वो कैसे चढ़ती थी
चैन चढ़ा कर वापस बैठे गंदे हाथ ग्रीस की बालो में पोंछे
पहियों में बल पड़ा हो या ताडिया टूटी हो चैन उतरती थी
साइकिल मिस्त्री के स्पैनर / पाना में छेद अठारह होते थे
पहिया खोले पंचर जोड़े साइकिल में हवा फ्री भरती थी।
चैन उतरने पर भी पैडल मारने की कदम ताल जारी हो
हौसला अफजाई वो भी आजमाती थी और लुढ़कती थी
पहले साइकिल न तो गंदी होती थी न उन्हें कोई धोता था
वो एटलस हरक्यूलस हीरो ए _वन हो कर चमकती थी
जब गिरते थे साइकिल से तो कभी वो ऊपर कभी हम
गुत्थम गुत्था होते साइकिल मेरी मेरी जान बचाती थी
सादर : शिव राम मीमरोठ
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