साहिब
जी मैं कुर्सी हूं कुर्सी हूं
अब तो प्लास्टिक, मेटल्स,
फाइबर सोना चांदी की
बनती हु विभिन्न रंग डिजाइन में
बस्ती हूं दिल की डिजायर में
साहिब ! मैं कुर्सी हु ,साहिब!
अब इंसानों की बस की बात नहीं
जो स्वेच्छा से दूरी करले कुर्सी से
जन्म लिया तो ,,पालना,, झूला,झुला
क्यों भुला?झूला , झुला भी कुर्सी हैं
हम बात करे क्या जिंदों की?
मुर्दों का भी हाल बुरा है, उनको तो
छोटी नहीं बडी चाहिए कुर्सी!
बैठने को नहीं लेटने को चाहिए
साहिब ! भूले! अर्थी भी तो कुर्सी है।
ठीक ही तो हैं,
युधिष्ठिर को मिले कुर्सी
मोहन भागता रहा
द्वारिका से हस्थिनापुर व इंद्रप्रस्थ के
गलियारों में
और अब
पूरी दुनिया दौड़ रही है।
यहां वहां सारा संसार ही दौड़ रहा है।
कुर्सी के चक्कर में।
कुर्सी की लालच में रसिया का संविधान
पोत दिया पुतिन ने,
पुतिन ई.2036 तक कुर्सी से चिपकेगा
रूस ने संविधान संशोधित कर
दिया कुर्सी के चक्कर में
और अदना सा अड़ गया
वोलोदोमीर जेलेंस्की कुर्सी के लिए
और
कुर्सी नही छोड़ेगा जेलेंसकी,
चाहे
यूक्रेन जेलेंस्की का जलता रहे
यूक्रेन के कुर्सी विहीन होने तक।
पहले महाभारत में बूढ़े बाप ने
,,महाराजा ,,
धृतराष्ट्र ने युवराज दुर्योधन को समझाया
नहीं
कुर्सी छोड़ने के लिए
कौरवों का अंत होने तक
और
अब भारत में एक मां ने भी
शायद
न तो समझा और न समझाया बेटे को
मोह त्यागने कुर्सी का चाहे
1885 से अब तक का इतिहास
तबाहा होने तक।
फाउंडेशन हो या फिर हो एनजीओ
UNO हो या हो फिर WHO दुनियां
किसान मोर्चा हो या छात्र यूनियन
अरावली हो या विंध्याचल आंचल
विचार कोई नहीं करता आदिवासियों
की मौलिक मूलभूत जरूरतों पर
जो भी मंच बने है वो सब उलझे है
मूछों के सवालो या कुर्सी के दावों में,
कोई मंच दवा नहीं लगा रहा
आदिवासियों के घावों में।।
साहिब!
आज का मानव रोबेट हैं
मुद्दा , प्रश्न, बहस या विमर्श
राजनीतिक हो या सरकारी
सामाजिक हो या जातिगत
रुचि पैदा करती है कुर्सी
इंसानों में समूह में बैठने को
और कुर्सी ही कारण बन
समुदायों के विघटन का।।
साहिब!
राष्ट्र अधक्ष्य, राज्य अध्यक्ष
चांसलर, ट्रिब्यूनल अधक्षय
CM-PM & MLA-MP
कब्र में पैर और कमर बाहर रहते हुए
अर्दांगनीसम परछाई और साएं सम
संगदिल कुर्सी से मोहब्बत करे तो करे
परंतु
सरकार के कल _पुर्जे,गियर_पिनियन, नट _बोल्ट
सरकारी अधिकारी / कर्मचारी
कुर्सी भी नहीं छोड़ते 64 साल 364 दिन 08 घंटे
अर्थात 60वर्ष का होने तक।
साहिब ,
कुर्सी की चाह वैसी ही होती हैं
जैसे मधुमेह के मरीज को चाय की चाह होती है
बदले में चाहे किडनी डेमेज हो भी जाए तो हो जाए मगर चाय नही छूटेंगी
आसानी से
वैसे ही COPD का मरीज बीड़ी,
सिगरेट व हुक्का पीना नहीं छोड़ता है।
साहिब!
अब तो हाल और भी बुरा है
कुर्सी के चक्कर में हर कोई
घनचक्कर हुआ फिरता है
हॉकर से कबाड़ी फेरीवाला तक
खोमचे वाले से काबुली चने वाले भी
चाय बेचने वाला से दारू
बेचने वाले
सभी
सपने संजोए हुए हैं कुर्सी पाने के
और
पाई हुई कुर्सी संग किंग जॉन,
पुतिन व शी _जिनपिंग सम
अजीवन चुपकु होने का।
नॉट: अब दुनिया में एक नई संवैधानिक संस्था :
" कुर्सी आयोग" बनने की कवायद शुरू हो गई हैं
जो जो भविष्य में सम्पूर्ण विश्वभर में election commission का स्थान ले सकता है।
सादर: शिव राम मीमरोठ
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