पहले परिवारवाद था, कतई नहीं था विचारों में रँग
समय के साथ बुराई फ़ियादिनी बन बैठी अच्छाई संग
समदर्शी बहन पर भाई हिरणकश्यपी कपटी रँग
यूँ कपट मन्त्रणा करने लगी, न करो प्रह्लाद से जंग
नेकी सच प्रतीक प्रह्लाद का धोखे से शमन की ठाणाली,
लड़कपन में नन्ना मुन्ना प्रह्लाद गोदी में बैठ गया भुआ संग
निठल्ली स्वार्थी कपटी झूठी भुआ होली की रँग रंगीली
मीठी मीठी प्यारी प्यारी गुलाबी बातें मानली,,,,,,,,,,(1)
हिरणकश्यप दूषित विचारधारा का असबाब लिए
बाजार में रावण , कंस सा बन गया सर्पदंश सा
होली का भतीजे से कपटतापुर्ण मधुर व्यवहार,
रिस्तो का प्यार प्रेम नही था केवल दिखावा था
नफरत से शुरू पर्व होलिका प्रेम से होली जलाते
आज तलक मानवता थकी नहीं ना ही राक्षस जले
ना मानवता में सच्चा प्रेम बढ़ा, न त्याग बड़ा,
सबसे ज्यादा स्वार्थ बड़ा मानवता में बहुमतवश
बे वजह बेवक्त ही गलती से गलतफहमी में हमने
उसके कपट को प्यार का रंग-गुलाल मानली .......(2)
एक दिवस का रंग टिकाऊ नही, 365 दिन रँगे रँग में
समाज के अंगरखा देखों पूरा रँगा झूठ भेदभाव का रंग,
चिलमन के पीछे असमानताओं से भरा फर्क का रंग
भारत की जीव्हा पर हर रात सवेरे तक जातिवाद का रंग
जिस्मपरस्ती विदेशों में जिस्म की चमड़ी के रंग का रंग
प्रोफ़ेशनल निठल्ले चमचों की चाटुकारिता वाकपटुता का रंग
भारत हलाल दफतरि दर्जें , एकम व दोयम दर्जे का रंग
सिक्के के दोनों पहलू राजनीति-प्रशासन दलाली -रिश्वत संग
अनायास ही मुद्दतोंसे हमने मुस्करके सच्चाई जानली,,,,,,,(3)
शिव राक्षसों को, राम रावण को, सिंघम ने हिरणकश्यप को
गोविंद आपका एक नही, असंख्य कन्सो से वास्ता पड़ेगा
कैसे कैसे साधना हैं निशाना, बिन गांडीव के आप सँभालो
हम तो गीता के कर्म सिद्धान्ती हैं, सुदर्शन आपको चलना है
अश्वस्थामा मरा अभी भी नही सिर्फ धोखा द्रोण को हुआ था
कर्ण कब कम था, उसका रथ वहाँ धँसा जहाँ पुराना कुआँ था
लद गए दिन अब ब्रज में होली के, जब तो आप थे राधा संग
महाभारत महज सत्य की
विजय गाथा, अब नही रमता किसी के तन मन पर सत्य का रंग... .. ..(4)
सादर: शिव राम मीमरोठ
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