हां मैं कांटा हूं
जी हां !
मैं कांटा हूं गुलाब का
मैने
दिन रात खपाए
रक्षा करने में
सहेजे रखने में
गुलाब को
मैने जख्मी किए
कई भंवरे
फूल की रक्षार्थ
हां! मै शूल हूं
गुलाब का
मैने लहूलुहान किया
माली को
कच्चे फूल तोड़ने पर
या चिड़ियाओं को
फूल पर बैठने पर
हां! मै कंटक हुं
मैने गुलाब बचाया
न केवल
चार पैर की बकरियों से
बल्कि दो पैर की
बकरियों से भी
वर्ना
ये सुमन बचता नही
सुरों पर चढ़ने को
हां! मै कांटा
नही बबूल का
किसी के राहों का
जो चुभे किसी के
पैर में
आंख वालों अंधों के
बिना आंख वालों
नयनसुख के
फिर यदि
मै! कांटा हूं
बबूल का
तो क्या हुआ ?
नेक हूं!
काम आहुंगा
किसी के पैर में
गढ़ा कांटा निकालने
यही
नियति की नीति है
सादर : शिव राम मीमरोठ
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