पता ही नहा रहा कब किशोर से प्रौढ हुए हम
जीवन की आपाधापी जिजीविषा की फ़िक्र ने ।
मैं भी दर्शक बना जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल
2024 का और राष्टिय कुश्ती दंगल 2024 ।
मेरा बचपन फिर से ज़िंदा है हुआ मेरे जहन में,
जब पहुँच मैं कुश्ती और किताबों के जहान में।
कुश्ती दंगल खेला जा रहा था गणपतिनगर
रेलवे क्रिकेट ग्राउंड जयपुर कॉलोनी दरम्या ।
इधर खुली हवा का लुत्फ़ खुले असमां नीचे
उधर जेएलएफ़ आमेर क्लार्क में ऊँचे से ऊँचे ।
कीर्तिमान बनाता और पुराने कीर्तिमान तोड़ता
उधर पुस्तकें फड़फड़ा रही पाठकों की चाह में ।
लेखक लाइव बतिया रहा श्रोताओं से राह में
ऑटोग्राफ की चाह में किताब थामे रहे बाँह में ।
कुश्ती दंगल में था अजीब मंगल ख़ुशी से सब सरोबार
धरती को चूमे, माथा टेक आसमान को छूने वाले खिलाड़ी ।
देखा विनम्रता का सागर और शालीनता का असमां साथ में
जेएलएफ़ आमेर क्लार्क में नदारद किताबों में हिन्दी को
खूब देखा पर नदारद पाया सुंदरियों के माथे से बिंदी को ।
अंग्रेज़ी में चटर-पटर करने वाले छौरियाँ छौरियाँ सभी
मशगूल मिले टेटूँ बनवाने, लिपस्टिक नैलपॉलिश लगाने में ।
किताबों से ज़्यादा सौंदर्य प्रदर्शन प्रदर्शित हुआ और किया।
जेएलएफ़ आमेर क्लार्क से पुस्तकें मैंने भी ख़रीदी थी।
जब बिल काउंटर पर भुगतान किया और जाने लगे हम
कान में ज्ञान के अस्तित्व की झंकार तब हुई जब एक ।
मौहतरमा दुकानदार में से बोली पैसे नहीं कार्ड भी नहीं
क्यूआर कोड दो मुझे मेरे दोस्त से ट्रांसफ़र करवाती हूँ।
माँ सरस्वती की संतानें अभी भी ज़िन्दी है भाषा हिन्दी है
प्रेम में प्रेम से पुस्तकें माँगी है आज भी, वर्ना अंग्रेज़ी की
औलाद प्रेम में प्रेमी के पैसे से टेंटू गुदवा रही है गाल पर।
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