अभी तो मोहबंध में बंधे ऐसे
जो सूर्य बंधा गगन में चांद से
दिल खोजे खुशी पर मिले नही
जब तलक ना देखे करीब से
दो दिल साथ होतो रब ना चाहिए
रब ने ये दिल बनाए अजीब से
इस दौर में सबको "सब" चाहिए
कोई दिल लगाये नही गरीब से
सब कुछ देता "गीता"कर्मफल
बस दोस्ती ही मिलती नसीब से
रस्सी पणिहारी नित पत्थर घिसे
ऐसे ही प्रेम मिले प्रेम के वजूद से
फाग में पराग और भाग में चिराग
दिल उमगे फिर क्यों डरे अंधकार से
निभाते चले रिश्ते जो जैसे मिले
मां बाप भाई बहिन मिले जन्म से
नीर में नयन नीर सा मिले प्रेम में
जो कान्हा मिले अर्धांगनी रुक्मणि से
सादर : शिव राम मीमरोठ " दुर्गेश "
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