याद करूखेलने होली हरा रंग खरीदे या लाल, उन्हे तो शायद हरा पसंद प्रेम के रंगे में रंगे को और रंग में रंगने का
जतन मैं ही क्यूँ करूँ
उनका पक्का रंग बेवफाई का और पक्का ही रंग जफायी का प्रेम रंग कच्चा जो साथ छोड़ता हो ऐसे कच्चे रंग से मन को होली क्यूं करू
गारंटी होती नहीं इश्क़ में रिश्ते जिस्म से स्थायी होंगे या रूह से कच्चें घागे सी मोहब्बत का मकड़ जाल में मैं ही अकेला क्यूँ करू
रंग बदलते लोगों के रंग बदलते रिश्ते में हर रोज़ रंग बदलतें सपनों नेरंगहीन होने से सदा रंगीन होना बेहतर पर ईर्ष्या गिरगिट से क्यूं करूं
पानी सम, आसमाँ सम हवा सम कोई रंग नहीं रंग मोहब्बत में खुद का चांदनी पारदर्शी रंगहीन होने से चाँद की चकोरी से मैं क्यूँ इश्क़ करूँ
सादर : शिव राम मीमरोठ "दुर्गेश"
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