उल्फत में उलझन यही थी की मैं समझा नहीं वो क्या क्या थी ?
जुल्फे सुलझाता रहा पहेली अनसुलझी रही क्या वो हमनवाई थी?
कैसे पहचानते अलहड़ता में हार्मोंस के सैलाब में खुद बहता रहा
कभी लगता तो था वो प्यारी थी जो भी थी पर हमनवाई न थी
दो पटरी पर चलने वाली रेल में बैठे जिए थे जुदाई के कुछ हसीन पल
अब जिंदगी की रेल बनी, हमदर्द छोड़ चले तो भान हुआ वो हमदर्दी थी
दोष इधर ही था सारा या कुछ उधर भी था या चहुं ओर फिजा कुलिषित थी
समय गुनाहगार था फरेबी समाज के फल भुगत रहे वो जो हमराज थी
जो छूट गया वो क्या था ? दिल में अंदर ही अंदर जो टूटा वो मेरा था या उनका?
जिंदगी 'मोनोरेल' बनी युग्म नही, अफसोस अब हुआ वो ही हमसफर थी
जो था जितने थे वो, सब आज तुमसे सांझा करू हिम्मत हो तो सुनो तो सही
दिल कब्र में राज दफन जितने भी हुए अब जांच में पाया वो हमराज थी।
जो, जितना, सब आज तलक भुना रहा हूं वो उनका ही है एक शब्द भी मेरे नहीं
दिल कब्र में पैर जब जायेंगे साथ में दिल में राज दफन ये होगा वो हमआलिंग थी।
सादर: शिव राम मीमरोठ
@कॉपी राइट रिजर्व
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