आयुर्वेदिक एलोपैथिक होम्योपैथी सब षड्यंत्र है
सफाखाना से पहले उन्हे मरीज का निमंत्रण है
हाथों से ढपली सा सहलाए वीना सी गले लगाए
वो बांस की बांसुरी बन आये सांसों का निमंत्रण है
काजल बन आंखो में रहे कोई आशा बन ह्रदय में
अंगूठी बन सोने की आओ तर्जनी का निमंत्रण है
फिर भी न आए तो भला कैसे मिलके गिला करेंगे
इंतजार में गुजरा नव वर्ष अब होली का निमंत्रण है
शब्द शब्द में रोज जो झरते हो कहानी बन जाओ
नज्म हो रूबाई हो गजल हो किताब का निमंत्रण है
भूख में रोटी प्यास में पानी रात में आंख का सपना हो
दफन से पहले वो कफन उढाए ये आखरी निमंत्रण है
सादर: शिव राम मीमरोठ "दुर्गेश"
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