रिश्तों को निभाने के लिय जो जैसा भी सगा संबंधी है
उसकी उसकी मूल प्रवृत्ति में ही स्वीकार करे ,
ऐसा कसने से विवादों, नॉक झोंक से बचा जा सकेगा।
दोस्तों खुले विचार होना जरूरी है
जो जैसा,उसे वैसा ही स्वीकारना है।
क्यों किसी को बदले अपने अनुसार
मिर्ची को तीखा इमली खट्टा रहनी है
लाखो के सोने , चांदी को छोड़ो
चुटकीभर सिंदूर बिंदी भी गहना है
सर्दी में भी आग सदैव ही गर्म हो
गर्मी में बर्फ को ठंडा ही रहना है
सोचें कभी साथ में बैठके चाय पीले
शिक्षा विहार शिवमार्ग पर ही रहना है
No comments:
Post a Comment