Friday, 15 March 2024

स्वप्न की आभासी दुश्मनी


जब जब मैं नींद में खोता हूं

और

तब तब रात के अंधेरे में चोर भाग जाते है

सुबह तलक रह जाती हैं

  दुश्मनों की सूची एक चौथाई

नींद में भाग गए चोर तीन चौथाई

क्यूं दुश्मनी करूं उन काले- गोरे छौरों से

मेरा कोई कम्पिटीशन ही नहीं जब चोरोंसे,,,,,१


मै  निजी दुश्मन, नहीं मानता,

उन चोरों को, हरामखोरो को

वतन  के गद्दारों को

जो खुद का हित साधने के लिए

वतन के हित को  दांव पर रखते हैं

वो काफिर , गुनाहगार देश के,

हक हड़पते है करोड़ों नागरिकों का

फिर भला मेरी तो बिसात ही क्या

हरामियों को हराम से रोकने की

फिर भी कोशिश करता हूं

हर जगह सुधार की , परन्तु

सुधार के नाम पर उंट के मुंह में जीरा

और हम  दबे सहमे जीते हैं तबादलों के साएं में,

मोर समान घौसला नहीं बनाते

हर रोज नये पेड़ की  नई टहनी

स्वागतम , बुद्धम शरणम् गच्छामि

करती हैं,

मेरे विश्राम के लिए

फिर वो मेरे निजी दुश्मन तो है नहीं

आपके  सबके और हमारे  सबके

समाज के सामूहिक दुश्मन हैं वो ,,,,,२


अब पत चला कि मेरा निजी

दुश्मन  हैं ही नहीं ,

उन सब की दुश्मनी को तो होश हवास में

वतन के खातिर मोल ली हैं,

मैने

फ़र्ज़ भर निभाने की ख़ुमारी में

अब तो हमारा ये पुनर्जन्म है

सच में दुश्मनी तो पुरानी ही हैं

आजादी  की आन्दोलन में

अच्छी खासी भूमिका थीं ,

हमरी,

होती भी क्यूं नहीं

समकालीन  ,562 रियासतों थीं,

एक  के  हम मालिक थे,

अपनी रियासत का खजाना खोल दिया था

आंदोलनकर्ता क्रांतिकारियों के लिए

और वो लोग गौरो के लिए करते थे,

जासूसी,,,,,,,3


तुम नहीं  जानते उनको,

हम जानते हैं

आज की नहीं दुश्मनी पुरानी हैं

व्यक्तिगत नहीं सैदांतिक है

पहले भी 1947 से पूर्व

वो फिरंगियों के साथ ही खड़े थे

अब जनवरी अगस्त में साल में

दो बार

तिरंगे के सामने खड़े हो के

सैल्यूट मारते हैं

मौका पड़ते ही सरकारी खजाने

में लूट मारते हुए है

मै  निजी दुश्मन, नहीं मानता, उन्हें,

हमरी उनसे दोस्ती भी वैसी ही हैं

जैसी सांप और नैवले की होती हैं

कौन कब बाजी मार जाएं

विसल/सिटी धवनतरी के पास है

ध्वनतरी की मती मेरी गई

वो आयुर्वैदिक से ज्यादा

एलोपैथिक को दिमाग में रखता है,,,,4


सादर: शिव राम Meemroth

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