जब जब मैं नींद में खोता हूं
और
तब तब रात के अंधेरे में चोर भाग जाते है
सुबह तलक रह जाती हैं
दुश्मनों की सूची एक चौथाई
नींद में भाग गए चोर तीन चौथाई
क्यूं दुश्मनी करूं उन काले- गोरे छौरों से
मेरा कोई कम्पिटीशन ही नहीं जब चोरोंसे,,,,,१
मै निजी दुश्मन, नहीं मानता,
उन चोरों को, हरामखोरो को
वतन के गद्दारों को
जो खुद का हित साधने के लिए
वतन के हित को दांव पर रखते हैं
वो काफिर , गुनाहगार देश के,
हक हड़पते है करोड़ों नागरिकों का
फिर भला मेरी तो बिसात ही क्या
हरामियों को हराम से रोकने की
फिर भी कोशिश करता हूं
हर जगह सुधार की , परन्तु
सुधार के नाम पर उंट के मुंह में जीरा
और हम दबे सहमे जीते हैं तबादलों के साएं में,
मोर समान घौसला नहीं बनाते
हर रोज नये पेड़ की नई टहनी
स्वागतम , बुद्धम शरणम् गच्छामि
करती हैं,
मेरे विश्राम के लिए
फिर वो मेरे निजी दुश्मन तो है नहीं
आपके सबके और हमारे सबके
समाज के सामूहिक दुश्मन हैं वो ,,,,,२
अब पत चला कि मेरा निजी
दुश्मन हैं ही नहीं ,
उन सब की दुश्मनी को तो होश हवास में
वतन के खातिर मोल ली हैं,
मैने
फ़र्ज़ भर निभाने की ख़ुमारी में
अब तो हमारा ये पुनर्जन्म है
सच में दुश्मनी तो पुरानी ही हैं
आजादी की आन्दोलन में
अच्छी खासी भूमिका थीं ,
हमरी,
होती भी क्यूं नहीं
समकालीन ,562 रियासतों थीं,
एक के हम मालिक थे,
अपनी रियासत का खजाना खोल दिया था
आंदोलनकर्ता क्रांतिकारियों के लिए
और वो लोग गौरो के लिए करते थे,
जासूसी,,,,,,,3
तुम नहीं जानते उनको,
हम जानते हैं
आज की नहीं दुश्मनी पुरानी हैं
व्यक्तिगत नहीं सैदांतिक है
पहले भी 1947 से पूर्व
वो फिरंगियों के साथ ही खड़े थे
अब जनवरी अगस्त में साल में
दो बार
तिरंगे के सामने खड़े हो के
सैल्यूट मारते हैं
मौका पड़ते ही सरकारी खजाने
में लूट मारते हुए है
मै निजी दुश्मन, नहीं मानता, उन्हें,
हमरी उनसे दोस्ती भी वैसी ही हैं
जैसी सांप और नैवले की होती हैं
कौन कब बाजी मार जाएं
विसल/सिटी धवनतरी के पास है
ध्वनतरी की मती मेरी गई
वो आयुर्वैदिक से ज्यादा
एलोपैथिक को दिमाग में रखता है,,,,4
सादर: शिव राम Meemroth
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