Monday, 8 April 2024

रक्षक हूँ तुम्हारा!




                      क्रिंग .....क्रिंग .....क्रिंग.......क्रिंग  दिल की या टेलीफ़ोन की घंटी बज उठी 
                                                हैलो !  मैं, -----बोल रहा हूँ। उधर से  लड़की का आवाज  मुखर हो उठी                                                                                                             मिस आप जो भी हो बोलिये                                                                                         मैं ...... बोल रही हूँ ........

हैलो ! कल के बर्ताव के लिए 



Sunday, 31 March 2024

हमनवाई तो थी मगर......

उल्फत में उलझन यही थी की मैं समझा नहीं वो क्या क्या थी ?
जुल्फे सुलझाता रहा पहेली अनसुलझी रही क्या वो हमनवाई थी?

कैसे पहचानते अलहड़ता में हार्मोंस के सैलाब में खुद बहता रहा
कभी लगता तो था वो प्यारी थी जो भी थी पर हमनवाई न थी

दो पटरी पर चलने वाली रेल में बैठे जिए थे जुदाई के कुछ हसीन पल
अब जिंदगी की रेल बनी, हमदर्द छोड़ चले तो भान हुआ वो हमदर्दी थी

दोष इधर ही था सारा या कुछ उधर भी था या चहुं ओर फिजा कुलिषित थी
समय गुनाहगार था फरेबी समाज के फल भुगत रहे वो जो हमराज थी

जो छूट गया वो क्या था ? दिल में अंदर ही अंदर जो टूटा वो मेरा था या उनका?
जिंदगी 'मोनोरेल' बनी युग्म नही, अफसोस अब हुआ वो ही हमसफर थी

जो था जितने थे वो, सब आज तुमसे सांझा करू हिम्मत हो तो सुनो तो सही
दिल कब्र में राज दफन जितने भी हुए अब जांच में पाया वो हमराज थी।

जो, जितना, सब आज तलक भुना रहा हूं वो उनका ही है एक शब्द भी मेरे नहीं
दिल कब्र में पैर जब जायेंगे साथ में दिल में राज दफन ये होगा वो हमआलिंग थी।

सादर: शिव राम मीमरोठ
@कॉपी राइट रिजर्व

Tuesday, 26 March 2024

होली तो, होली! पर नहीं हुई! जैसी होनी थी

होली, तो होली, पर वैसी नहीं हुई! जैसी होनी थीपूनम की रात चांदनी हुई,वैसी नहीं,जैसी होनी थीचांदनी तो थी पूनम की रात में चांद भी था बदलो में होली वो मन से उजली तो थी वैसी नहीं जैसी होनी थीहोली पर रंग में भंग होली, दूध में भांग घोली तो थीमुझे रंग में साना,नजदीकी बढ़ी, वैसे नहीं जैसे होनी थीचेहरा उनका हरा करना था होठ लाल रंग में रगने थेलब लाल किए पर वैसी नहीं जैसे लिपस्टिक से होनी थीशब्द शब्द में रंग घुला उनकें पता नही वो रंगरेज तो नहीखुशी दूरभाष पर बतियाने से मिली वैसे नहीं जैसी होनी थीवो पास खूब बैठते है हमदर्दी बन हमरंगी बन रंगरेजउनके रंग से मेरी रूह रंगी पर जिस्म वैसे नहीं जैसी होनी थीअब होली गई मगर रंग जो बचा रह गया उसे कब लगाहुँमुश्क उनकी इश्क में रंगी तो है पर वैसी नहीं जैसी होनी थीसादर: शिव राम मीमरोठ दुर्गेश@ कॉपी राइट रिजर्व

Monday, 25 March 2024

होली का रंग : रूह या जिस्म में लगा

होली पर आज वो फिर याद आए पर इकतरफ़ा क्यूं याद करूपता नही वो याद करते होंगे भी नहीं फिर मैं ही क्यूँ

 याद करूखेलने होली हरा रंग खरीदे या लाल, उन्हे तो शायद हरा पसंद प्रेम के रंगे में रंगे को और रंग में रंगने का
जतन मैं ही क्यूँ करूँ 
 
उनका पक्का रंग बेवफाई का और पक्का ही रंग जफायी का प्रेम रंग कच्चा जो साथ छोड़ता हो ऐसे कच्चे रंग से मन को होली क्यूं करू

 गारंटी होती नहीं इश्क़ में रिश्ते जिस्म से स्थायी होंगे या रूह से कच्चें घागे सी मोहब्बत का मकड़ जाल में मैं ही अकेला क्यूँ करू 

 रंग बदलते लोगों के रंग बदलते रिश्ते में हर रोज़ रंग बदलतें सपनों नेरंगहीन होने से सदा रंगीन होना बेहतर पर ईर्ष्या गिरगिट से क्यूं करूं

पानी सम, आसमाँ सम हवा सम कोई रंग नहीं रंग मोहब्बत में खुद का चांदनी पारदर्शी रंगहीन होने से चाँद की चकोरी से मैं क्यूँ इश्क़ करूँ 

 सादर : शिव राम मीमरोठ "दुर्गेश" 
 कॉपी राइट रिज़र्व

Saturday, 23 March 2024

महिमा मंडन कुर्सी का

साहिब

 जी मैं कुर्सी हूं कुर्सी हूं

पहले मै लकड़ी की थी
अब तो प्लास्टिक, मेटल्स,
फाइबर सोना चांदी की
बनती हु विभिन्न रंग डिजाइन में
बस्ती हूं दिल की डिजायर में
साहिब ! मैं कुर्सी हु ,साहिब!
अब इंसानों की बस की बात नहीं
जो स्वेच्छा से दूरी करले कुर्सी से
जन्म लिया तो ,,पालना,, झूला,झुला
क्यों भुला?झूला , झुला भी कुर्सी हैं
हम बात करे क्या जिंदों की?
मुर्दों का भी हाल बुरा है, उनको तो
छोटी नहीं बडी चाहिए कुर्सी!
बैठने को नहीं लेटने को चाहिए
साहिब ! भूले! अर्थी भी तो कुर्सी है।
ठीक ही तो हैं,
युधिष्ठिर को मिले कुर्सी
मोहन भागता रहा
द्वारिका से हस्थिनापुर व इंद्रप्रस्थ के
गलियारों में
और अब
पूरी दुनिया दौड़ रही है।
यहां वहां सारा संसार ही दौड़ रहा है।
कुर्सी के चक्कर में।
कुर्सी की लालच में रसिया का संविधान
पोत दिया पुतिन ने,
पुतिन ई.2036 तक कुर्सी से चिपकेगा
रूस ने संविधान संशोधित कर
दिया कुर्सी के चक्कर में
और अदना सा अड़ गया
वोलोदोमीर जेलेंस्की कुर्सी के लिए
और
कुर्सी नही छोड़ेगा जेलेंसकी,
चाहे
यूक्रेन जेलेंस्की का जलता रहे
यूक्रेन के कुर्सी विहीन होने तक।
पहले महाभारत में बूढ़े बाप ने
,,महाराजा ,,
धृतराष्ट्र ने युवराज दुर्योधन को समझाया
नहीं
कुर्सी छोड़ने के लिए
कौरवों का अंत होने तक
और
अब भारत में एक मां ने भी
शायद
न तो समझा और न समझाया बेटे को
मोह त्यागने कुर्सी का चाहे
1885 से अब तक का इतिहास
तबाहा होने तक।
फाउंडेशन हो या फिर हो एनजीओ
UNO हो या हो फिर WHO दुनियां
किसान मोर्चा हो या छात्र यूनियन
अरावली हो या विंध्याचल आंचल
विचार कोई नहीं करता आदिवासियों
की मौलिक मूलभूत जरूरतों पर
जो भी मंच बने है वो सब उलझे है
मूछों के सवालो या कुर्सी के दावों में,
कोई मंच दवा नहीं लगा रहा
आदिवासियों के घावों में।।
साहिब!
आज का मानव रोबेट हैं
मुद्दा , प्रश्न, बहस या विमर्श
राजनीतिक हो या सरकारी
सामाजिक हो या जातिगत
रुचि पैदा करती है कुर्सी
इंसानों में समूह में बैठने को
और कुर्सी ही कारण बन
समुदायों के विघटन का।।
साहिब!
राष्ट्र अधक्ष्य, राज्य अध्यक्ष
चांसलर, ट्रिब्यूनल अधक्षय
CM-PM & MLA-MP
कब्र में पैर और कमर बाहर रहते हुए
अर्दांगनीसम परछाई और साएं सम
संगदिल कुर्सी से मोहब्बत करे तो करे
परंतु
सरकार के कल _पुर्जे,गियर_पिनियन, नट _बोल्ट
सरकारी अधिकारी / कर्मचारी
कुर्सी भी नहीं छोड़ते 64 साल 364 दिन 08 घंटे
अर्थात 60वर्ष का होने तक।
साहिब ,
कुर्सी की चाह वैसी ही होती हैं
जैसे मधुमेह के मरीज को चाय की चाह होती है
बदले में चाहे किडनी डेमेज हो भी जाए तो हो जाए मगर चाय नही छूटेंगी
आसानी से
वैसे ही COPD का मरीज बीड़ी,
सिगरेट व हुक्का पीना नहीं छोड़ता है।
साहिब!
अब तो हाल और भी बुरा है
कुर्सी के चक्कर में हर कोई
घनचक्कर हुआ फिरता है
हॉकर से कबाड़ी फेरीवाला तक
खोमचे वाले से काबुली चने वाले भी
चाय बेचने वाला से दारू
बेचने वाले
सभी
सपने संजोए हुए हैं कुर्सी पाने के
और
पाई हुई कुर्सी संग किंग जॉन,
पुतिन व शी _जिनपिंग सम
अजीवन चुपकु होने का।
नॉट: अब दुनिया में एक नई संवैधानिक संस्था :
" कुर्सी आयोग" बनने की कवायद शुरू हो गई हैं
जो जो भविष्य में सम्पूर्ण विश्वभर में election commission का स्थान ले सकता है।
सादर: शिव राम मीमरोठ
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You and Sharad Kumar Dave

Monday, 18 March 2024

तुम्हारे लिए मर के भी देख लिया

एक रोज रात स्वप्न में हो गया था मै ही स्वर्गवासी
मुझे भा गया प्रकृति का अजूबा अस्थाई स्वर्गप्रवासी
मेरी एक्स X को खबर नहीं,कैसे आती शौक जताने
आपस में हम है दशकों से गुमशुदा हम भये संन्यासी
डबल एक्स मेरी जेड हाजिर हुई पर वो शादीशुदा
दुख उसे भी हुआ इकतरफे प्रेमी जाने का अनायासी
जिस रोज अस्थाई रूप से स्वप्न में स्वर्ग सिधारे हम
अर्धांगनी को हुई ज्यादा बैचेन जो जुड़ी थी हृदयसी
धीरज बंधाने न आए भाई बांधव आए न सहकर्मी
ना सिधारे कोई स्वजन सगे संबंधी जो थे सहोदरसी
मुझे अफसोस न हुआ कोई बाल सखा न खास हुआ
नही कोई हम उम्र युवा सखा जो रोए न बन सियासी
कौन है जो खबर को नही लेगा हवा के झोंके मानद
ना मैं जिंदा किसी से जुड़ा न अस्थाई मुर्दा योमवासी
अब कैसे जोडूं झूठे लोगों से प्रेम, होंके झूठा जुदा
नीद खुली सपना टूटा वापस लौटा घर बन रहवासी
सीख यही मेरी दोस्तों, दोस्त बनाओ,दोस्त बनाओ,
कोई मेरा_अपना दोस्त नहीं जो मिले बाहें भरासी
स्वप्न में मरने पर याद नहीं किया रिश्तेदारोंवफादारों ने
अच्छा होता मेरी एक्स को खबर करता वो गले लगासी
जिन्दे के रिश्ते नाते जिंदे के सगे बने सब कुटुंब कबीला ,
मरने पर याद करेगा दोस्त छबीला जो हो हमगिलासी
सादर : शिव राम मीमरोठ
@कॉपी राइट रिज़र्व

काल Vs परिस्थिति

 काल,

परिस्थिति
एवम् स्थान
अनुसार
यदि
कलम और जिव्हा
स्वतंत्र नहीं हो
तो
समझे की
विश्व में
आजादी महज एक कल्पना है!
हकीकत नही!

आसमां की तपन से

 आसमां की तपन से

सागर नीर
बरखा में बादलों से बरसता है
और
रिश्तों की तपन में
मनप्रेमनीर नयन से झरता है।
कहत शिवराम रिश्तों की
तपन से
मन सागर सम
और
आंख पगली बन
बदली बन जाती है।
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पहला प्रेम कोई कैसे भूले?

 पहला प्रेम कोई कैसे भूले?

क्यों भूले?
जन्म हुआ तो मां को देखा,
देखते ही प्रथम दफा इस ग्रह पर, ।
मां को बच्चे से और बच्चे को मां से
पहला प्रेम हो गया दोनो माताओं से।
एक धरती मां दूसरी जननी मां
बस ! इसी प्रेम की पुरावृति है।
ये जन्म दिन और हम मनाते है
हर साल कोई सी भी मां के साथ।
जस का तस मनाते है अभी
मैरिज एनिवर्सरी हर साल।
प्रथम मिलन प्रियतमा से
और पहला प्रेम अर्दांगनी से।
पहला पहला प्यार ! मेरे यार !
खुशी से मनाओ जन्म दिन।
और
एनिवर्षरी मैरिज की खुद की
शादी की यादें ताजा करने को!
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रिश्तों को निभाने के लिय

 रिश्तों को निभाने के लिय जो जैसा भी सगा संबंधी है

उसकी उसकी मूल प्रवृत्ति में ही स्वीकार करे ,

ऐसा कसने से विवादों, नॉक झोंक से बचा जा सकेगा।

दोस्तों खुले विचार होना जरूरी है
जो जैसा,उसे वैसा ही स्वीकारना है।
मूल रूप में स्वीकार करे सभी को
नमक खारा गुड मीठा ही रहना है
क्यों किसी को बदले अपने अनुसार
मिर्ची को तीखा इमली खट्टा रहनी है
लाखो के सोने , चांदी को छोड़ो
चुटकीभर सिंदूर बिंदी भी गहना है
सर्दी में भी आग सदैव ही गर्म हो
गर्मी में बर्फ को ठंडा ही रहना है
सोचें कभी साथ में बैठके चाय पीले
शिक्षा विहार शिवमार्ग पर ही रहना है

अविभाजित वजूद

पता ही नहा रहा कब किशोर से प्रौढ हुए हम
जीवन की आपाधापी जिजीविषा की फ़िक्र ने ।
बना दिया मुझे रोबोट या कठपुतली फ़र्ज़ ने
तीन से चार फ़रवरी 2024 शनिवार रविवार ।
मैं भी दर्शक बना जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल
2024 का और राष्टिय कुश्ती दंगल 2024 ।
मेरा बचपन फिर से ज़िंदा है हुआ मेरे जहन में,
जब पहुँच मैं कुश्ती और किताबों के जहान में।
कुश्ती दंगल खेला जा रहा था गणपतिनगर
रेलवे क्रिकेट ग्राउंड जयपुर कॉलोनी दरम्या ।
इधर खुली हवा का लुत्फ़ खुले असमां नीचे
उधर जेएलएफ़ आमेर क्लार्क में ऊँचे से ऊँचे ।
कीर्तिमान बनाता और पुराने कीर्तिमान तोड़ता
उधर पुस्तकें फड़फड़ा रही पाठकों की चाह में ।
लेखक लाइव बतिया रहा श्रोताओं से राह में
ऑटोग्राफ की चाह में किताब थामे रहे बाँह में ।
कुश्ती दंगल में था अजीब मंगल ख़ुशी से सब सरोबार
धरती को चूमे, माथा टेक आसमान को छूने वाले खिलाड़ी ।
देखा विनम्रता का सागर और शालीनता का असमां साथ में
जेएलएफ़ आमेर क्लार्क में नदारद किताबों में हिन्दी को
खूब देखा पर नदारद पाया सुंदरियों के माथे से बिंदी को ।
अंग्रेज़ी में चटर-पटर करने वाले छौरियाँ छौरियाँ सभी
मशगूल मिले टेटूँ बनवाने, लिपस्टिक नैलपॉलिश लगाने में ।
किताबों से ज़्यादा सौंदर्य प्रदर्शन प्रदर्शित हुआ और किया।
जेएलएफ़ आमेर क्लार्क से पुस्तकें मैंने भी ख़रीदी थी।
जब बिल काउंटर पर भुगतान किया और जाने लगे हम
कान में ज्ञान के अस्तित्व की झंकार तब हुई जब एक ।
मौहतरमा दुकानदार में से बोली पैसे नहीं कार्ड भी नहीं
क्यूआर कोड दो मुझे मेरे दोस्त से ट्रांसफ़र करवाती हूँ।
माँ सरस्वती की संतानें अभी भी ज़िन्दी है भाषा हिन्दी है
प्रेम में प्रेम से पुस्तकें माँगी है आज भी, वर्ना अंग्रेज़ी की
औलाद प्रेम में प्रेमी के पैसे से टेंटू गुदवा रही है गाल पर।
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Piara Singh Singh, Meena Lal Gopal and 9 others

तुम मुझे अच्छे लगते हो

तुम मुझे अच्छे लगते हो लगेंगे भी
मेरी गलती को नजरंदाज करते हो।
मेरी खामियों में खूबियां ढूंढते हो
ऐसा चमचा हर थाली को पसंद है।
जब ये कानों में मिश्री घोलते है
सभी के चेतन की अचेतन से ईर्ष्या।
अब तो मधुशाला की सांकी चमचा
निज धर्म चमचो का रगड़ते है।
पैंदा थाली का थाली के टूटने तक
अब सॉफ्ट चमचे भी मिलेंगे खूब।
जो मुड़ मुड़ कर झुक झुक कर
सेवा देते है भरी थाली में कटोरी में ।
बाद में यही मधुर सॉफ्ट चमचे
प्लास्टिक के चमचे तो फेंके जाते है।
सड़क पर पड़ोसी की चौखट ओर
मगर हार्ड चमचे को धो के काम लेते।
स्टील चांदी का को मूल्य भाव होता है
इंसानी चमचे वास्तविक चमचे से सीखे।
जो झुका नही मुड़ा नही वो ही सहेजे
वर्ना सॉफ्ट अवसरवादी प्लास्टिक के।
सुंदर सुंदर रंगीन चमचे कबाड़ी के
कबाड़ में धूप सैंकते है तो ठंड सहते है।
चमचागीरी का हुनर गजब है कबसे है
चमचे सकुनी मामा के बिना महाभारत ।
दासी मंथरा के बिना रामायण नही होती
कौन था वो चमचा जिसने कायदे आदम।
जिन्हा को फुसलाया और पाक बनवाया
था कोई जिसने गांधी जी को आमरण।
अनशन पर बिठाके पूनापैक्ट तुड़ाया
वर्ना इंडिया अमरीका से आगे होता।
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You, Atulkumar Srivastava, Devender Singh Thind and 15 others

मन करे आपका

 जहां बार बार जाने को मन करे आपका मंदिर है वह जगह तो वहां मूर्ति में देवता।

वह घर है किसी का वहा इंसानी देवता
दर्शन करे मूर्ति के या खुदा की खुदाई के।
जहां जायेंगे वहां वैसा ही तो तुम पाओगे
कहत कबीर जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे ।
कदम अनायास उठे सदा जहां जाने को
मंदिर हो मस्जिद हो गिरजाघर या घर हो।
नेक इरादों से नेकी करे दरियां में न फेंके
आरजू पूजा में बदल जाए तो मन न रोकें।
खुद खुदा, येशु, शिव, बुद्ध कोई न कोई
करेंगे कृपा आप पर वो मजहब हो जैसा ।

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