Monday, 18 March 2024

जब और अब

पहले बारिश में सावन बरसता था
अब बारिश में पानी बरसता है ।।
पहले दर्शन को आंखे तरसती थी
अब तो पाने को मन तरसता है।।
पहले गावों में कोयल कूकती थी
अब बागों में कोए कांव करता है।।
पहले आंखों में चाहत झलकती थी
अब दिल ए जिगर में हूक उठती है।।
पहले उनकी दुनिया में हमारा मान था
अब हमारी दुनिया उनका मान बढ़ा है।।
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सबसे सुलभ धर्म

 सबसे सुलभ धर्म

और

अति दुर्लब अधर्म!
आज तक समझ नही आया,
प्रेम किसे माने!
कृष्ण _राधा का प्रेम !
या कृष्ण_रूक्मणी का प्रेम!
तुम्ही बताओ!
समझ ही नही आता
की अधर्म क्या है?
राजसभा में रजस्वला द्रोपदी का
चीर हरण !
या
युद्धक्षेत्र में निहत्थे कर्ण का वध!
इन्हे अपनी नजरो से देखे,
न की
धर्म की नजरो से ,
धर्म तो
हिंदू,मुस्लिम,
सिक्ख, ईसाई
एवम् बौद्ध _यहुदियों
के
घरों में जन्में बच्चे को
मुफ्त में आबंटित होता है।
सादर: शिव राम मीमरोठ
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त्रिवेणी : X Y Z

हमझोली मिले, पर रह गए गिले, जिन्हे ढूढते दिल में
क्या खाक पढ़ू अखबारों में वो मिले नही फेसबुक में
चश्मा साफ किया बाजार में देखा भीड़ में खोजा उनको
लंच डिनर की सभी जगह खंगाली ढूंढा एक्स ट्विटर में
दिल पर हाथ रखूं तो धड़कन बढ़ती डॉक्टर याद आती
खून चूसा लवेरिया ने, बदनाम हुआ मच्छर मलेरिया में
इश्क में,मदद करे नही कोई और तकनीकी करे छलाव
ब्लू ब्लू आंखो की यादें ताजा होती, हर रोज ब्लूटूथ में
ऑनलाइन ऑफलाइन जादू टोना ज्योतिष सभी तलाशे
सर्च करे पर नही मिले रसोईशयनकक्षबाथरूम गूगल में
बीएसएनएल लैंड लाइन मुलाकातें का जरिया पुराना था
अब टैक्स्ट मैसेज भी नही मिलते टेलीग्राम व्हाट्सऐप में
इस्तहार देखा पर मिले नही सोशलमीडिया इंस्टाग्राम में,
पिनकोड भी पता नही आजकल वो रहते कौनसे ग्राम में
क्या भूले क्या याद करे सब कुछ क्षत विक्षत किया हमने
जला दिए कागज के सारे टुकड़े चेहरा कैसे देखे खत में।

मेरे जूठे होठ झूठ बोलते है

मेरे होठ झूठ बोलते है इनकी हंसी पे तुम यकीं न करना
अक्स पर दर्द न झलके होठों की खुशी पे यकीं न करना
मेरा दर्द दर्पण में अश्क संग बरसे होठ फिर भी मुस्कराए
झूठे है मेरे होठ, इन्हे होठों से छू के होठ झूठे न करना
ये होठ मेरे नहीं है मुझे वसीयत में मिले किसी जोंक से
छूने से हिमोफिलिया हो तुम किसी दवा में यकीं न करना
दिल डूबा लबालब दर्द से भरे प्रेमसागर मानसरोवर में
कल नाता तोडलूं तो तुम आजके प्रेम में यकीं न करना
तुम्हारे अंक में छुप कर मुस्कराना मेरे होठों की फितरत
मेरे होठों के साथ बहक कर तुम इश्क में यकीं न करना
होठ पहले तो साफ थे इन्हे झूठा किया किसी ने बाद में
तुम झूठों को क्या झूठा करोंगे?उथले में यकीं न करना

महाभारत के सात कारण V/s युगों की वसीयत

 महाभारत के सात कारण V/s युगों की वसीयत

दोस्तों !...... दोस्तों !... दोस्तों !...
दोष देना बंद करो
हमरे भारतवर्ष को , दोस्तों
हमरे हिंदुस्तान को हिंदुस्तनियों
इसे तो, हमें तो, हमरे इंडिया को
सब वशीयत में मिला है हमको !
हस्थीनापुर , आर्यावर्त और इन्द्रप्रस्थ से,
दिल्ली सी संसद और दुशासन से दागी सांसद
और महारथी कर्ण से मूक बधिर महामंत्री
सब वशीयत में मिला है !
पितामह भीष्म सा समर्पित राष्ट्नायक राष्टपति
मामा शकुनी सा शुभचिंतक महामहिम राज्यपाल
वसीयत में मिले मिले पडोसी और पड़ोसन
पाक चाइना बन क्र जन्मे जयद्रथ जरासंध्र
समाजिक और राजनितिक कमजोरियां,
व्यक्तिगत बुराइयें, पौराणिक प्रथाएं,
अन्धविश्वास एवं फर्क की राजनीति ।
अग्रज धृतराष्ट की जन्मांधता
बाहर और भीतर से,
दोनों तरह से : तन से और मन से अंधता,
आँखों से तो था ही अँधा,
परन्तु था मन से भी अँधा
अंधे की आँखों में चमक थी की येन केन प्रकारेण
पुत्र दुर्योधन बने राजा !
आज भी घर समाज और राजनीती में प्रचलित हैं,
यही वंशवाद परम्परा भी थी
पहला कारण महाभारत का।
कुंती का चाल चलन,
ऋषि दुर्वासा का वरदान
सूर्य संग गुप्तगुं जो की लडकपन में
कर्ण के रूप सूर्य की धुप में,
नदीं में बहा दी ममता,
फिर भी कहलाई राजमाता!
आँचल के दाग छुपाने में माहिर पृथा,
बेदाग आँचल बचा न सकी पांचाली का
कुंती बेबस थी खुद का दामन थामने मे,
जो खोल देती राज राजमाता राजसभा में,
पुत्र कर्ण !
तुम पांडवों में श्रेष्ठ हो,
पांचाली द्रोपदी के जेष्ठ हो !
कसम ! क़ायनात की
छूआ भी जो आँचल कुलवधू का,
कर्ण के हाथों,
कौरव राजसभा में धुर्योधन के चीथड़े चीथड़े होते ,
कुंती का यूँ मौन रहना, द्रोपदी का अपमान होना भी था
दूसरा कारण महाभारत का,
वंशवाद -जेष्ठता, पराक्रम से मूल रूप से वास्तविक उत्तराधिकारी था,
आर्य कुल का , हस्तिनापुर का
माहरथी कर्ण !
परन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनाना
महात्मा व्यास का ,
जननी राजमाता कुंती का
वयोवृद्ध पितामह भीष्म का
धर्मरक्षक वासुदेव का
यूँ तथ्यों को नजर अंदाज करके योग्यता गला घोटना
सभस्थलों में कर्ण का अनादर करना या देखना भी था
तीसरा कारण महाभारत का।
गंगा पुत्र देवव्रत का आजीवन ब्रह्र्चार्य व्रत की
भीष्म प्रतिज्ञा महज सफलता भर थी
पितामह भीष्म की नपुसंकता छुपाने की और
मान सम्मान और प्रतिष्ठा
Modern “Protocol"
पाने की थोथी चाह में / लालच में
आर्यव्रत के सभास्थलों में
दुराचारी व्यभिचारी अत्याचारी दुर्योधन के
अत्याचारों को खुली आँखों से देख के भी
भीष्म का संजीदा गूंगापन, मुकदर्शिता,हठता भी थी
चौथा कारण माहभारत का
दो नावों में तैरने की पारंगतता
तराजू के दोनों पलड़ों में बाँट रखने में विख्यात
सम्पूर्ण आर्याव्रत का गुरु, कौरव पांडवों का कुलगुरू
आचार्य द्रोण, गुरुद्रोण का दोगलापन
प्रेम अर्जुन से एवम पक्ष कौरवों का
सदैव ही सभास्थलों और युद्धस्थलों में
राजगुरु में शिष्य प्रेम से ज्यादा पुत्र मोह
पुत्र अशवस्थामा का मित्र मोह ने दुर्योधन को सम्बल दिया
राष्टीय पथप्रदर्शक की नैतिक पंगुता भी थी
पांचवा कारण महाभारत का
रूप सुन्दरी स्वप्न सुन्दरी क्षत्राणी कर्ण की पत्नी की देवरानी ने
स्वंवर में महारथी कर्ण को अक्षत्रि कह के
रोक दिया था प्रतिंच्या चढाने से धनुष पर
चिन्ह जो बने थे प्रतिंच्या से उँगलियों में,
पांचाली के नस्तर से शब्द पर निकल गये पर दिल के
गुस्से में लाल पिला हो के, कर्ण बहार निकल गया महफ़िल के,
राधा पुत्र महारथी अंगराज के जख्म थे अभी हरे के हरे
वक्त ढंग से मलहम लगता पर वक्त को भी वक्त कम मिला
और
युधिष्ठर ने राजभिषेक के लिए भीष्म व्यास द्रौण दुर्योधन कर्ण को
इन्द्रप्रस्थ उत्सव का न्योता जो भेजा,
साज सज्जा और असबाब ले युवराज जा धमका
चाँद की चांदनी में महल के जलाशय को समझा संगमरमर की फर्स
जलमग्न हुए युवराज दुर्योधन के उघड जो गये राजसी वस्त्र
जलमग्न दुर्योधन जलाशय में बेहाल देखके, कर्ण की भ्रकुटी कुछ यूँ तनी की
देखता हैं ! जलाशय स्वंवरसा जलपात्र और
समय का धूमता पहिये पर दुर्योधन सी मछली
आव देखा न, तांव देखा इन्द्रप्रस्थ की कुलवधू ने,
समझे बिना ही नजरों की नजाकत
अंधे का अँधा हस्तिनापुर युवराज को कह डाला ,
जल से जल्लाद सा गरजा दुर्योधन मित्र, कर्ण !
मुद्दा राज का नही, साम्राज्य का नही अब तो दोस्त !
मसला ! जर का नही, जोरू का नही, दोस्त, जमीं का भी नही
अस्त्रों का नही, शस्त्रों का नही दोस्त ! ,
मुद्दा मेरे राजसी वस्त्र का है,मुद्दा वस्त्रों का हैं !
मैं लूँगा बदला वस्त्रों का वस्त्रों से........
इद्र्प्रस्थ उत्सव में द्रोपदी के ये तीखे बोल भी थे
छ्ठा कारण महाभारत का।
कृष्ण की विद्वता, सहजता, अलौकिकता, धर्मपरायणता
कृष्ण ! अर्जुन का दोस्त सगा और सलाकार भी था
कुंती का खास भतीजा होना उसकी भी कमजोरी थी,
अर्जुन की इकलोती पत्नी अभिमन्यु की माँ “ सुभद्रा ”
दूरदराज से नही थीं वो, कृष्ण कुल के यादवों की छोरी थी
इतना सब कुछ जन बुझ कर, क्यों अनजान बने रहे कान्हां ?
क्यां भारी था, अलौकिक सुदर्शन पर लौकिक दुर्योधन ?
गर्दन काट फेंकता कब का, पर वो तो विधाता था ?
“ राधा ने कसम जो कान्हा को दिलवायीं “
इन उँगलियों से बंसी की मधुर धुन सुन के
मथुरा वृन्दावन,बाल गोपाल गोपियाँ, मन्त्र मुग्ध कियें
जिन उँगलियों पर, गोवर्धन धरा और जनता को इंद्र से भय मुक्त किया
जो हाथ प्यार के हैं, उन हाथों में कभी तुम ,
अपने हाथों में कान्हा, अस्त्र –सस्त्र मत लेना, विध्वंस कभी मत करना
जब जब पाप बढ़े दुनिया में, आपस में विध्वंस भलाई करवा देना,
कान्हा, अपने हाथों में अस्त्र –सस्त्र मत लेना, चाहे आफत कितनी आयें
जोरी से कोई वार करे, वार बचाके भग जाना,दूर कहीं छुप जाना
लोग भलाई रणछोड़ कहे, अजी कहते रहे ,दूर सुरक्षित भग जाना
मेरे कान्हा, हाथों में अस्त्र –सस्त्र मत लेना,
विपदा कोई और बड़ी सी / भी आजायें,
गोकुल छोड़ो, मथुरा छोड़ो , चाहे छोड़ो वृदावन दूर कहीं चले जाना
राधा ! मैं वादा करता हूँ अस्त्र सस्त्र नही छुहुंगा
जरूरत पड़ी तो रण में भी रणछोड़ के भग लूँगा, पर अस्त्र सस्त्र नही छुहुंगा
चाहे रणछोड़ कहलाऊंगा,
पूर्व के गोकुल,मथुरा, वृदावन छोड़के पश्चिम में दूर द्वारका बसाऊंगा .
जो कान्हा ने स्वीकारी , राधा की वो मदुर कसम भी थी
सातवां कारण महाभारत का.
सादर : शिव राम मीमरोठ
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रगों का रंग राग दिल में।

 होली बहुत बहुत मुबारक हो V/s रगों का रंग राग दिल में।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पहले परिवारवाद था, कतई नहीं था विचारों में रँग
समय के साथ बुराई फ़ियादिनी बन बैठी अच्छाई संग
समदर्शी बहन पर भाई हिरणकश्यपी कपटी रँग
यूँ कपट मन्त्रणा करने लगी, न करो प्रह्लाद से जंग
नेकी सच प्रतीक प्रह्लाद का धोखे से शमन की ठाणाली,
लड़कपन में नन्ना मुन्ना प्रह्लाद गोदी में बैठ गया भुआ संग
निठल्ली स्वार्थी कपटी झूठी भुआ होली की रँग रंगीली
मीठी मीठी प्यारी प्यारी गुलाबी बातें मानली,,,,,,,,,,(1)
हिरणकश्यप दूषित विचारधारा का असबाब लिए
बाजार में रावण , कंस सा बन गया सर्पदंश सा
होली का भतीजे से कपटतापुर्ण मधुर व्यवहार,
रिस्तो का प्यार प्रेम नही था केवल दिखावा था
नफरत से शुरू पर्व होलिका प्रेम से होली जलाते
आज तलक मानवता थकी नहीं ना ही राक्षस जले
ना मानवता में सच्चा प्रेम बढ़ा, न त्याग बड़ा,
सबसे ज्यादा स्वार्थ बड़ा मानवता में बहुमतवश
बे वजह बेवक्त ही गलती से गलतफहमी में हमने
उसके कपट को प्यार का रंग-गुलाल मानली .......(2)
एक दिवस का रंग टिकाऊ नही, 365 दिन रँगे रँग में
समाज के अंगरखा देखों पूरा रँगा झूठ भेदभाव का रंग,
चिलमन के पीछे असमानताओं से भरा फर्क का रंग
भारत की जीव्हा पर हर रात सवेरे तक जातिवाद का रंग
जिस्मपरस्ती विदेशों में जिस्म की चमड़ी के रंग का रंग
प्रोफ़ेशनल निठल्ले चमचों की चाटुकारिता वाकपटुता का रंग
भारत हलाल दफतरि दर्जें , एकम व दोयम दर्जे का रंग
सिक्के के दोनों पहलू राजनीति-प्रशासन दलाली -रिश्वत संग
अनायास ही मुद्दतोंसे हमने मुस्करके सच्चाई जानली,,,,,,,(3)
शिव राक्षसों को, राम रावण को, सिंघम ने हिरणकश्यप को
गोविंद आपका एक नही, असंख्य कन्सो से वास्ता पड़ेगा
कैसे कैसे साधना हैं निशाना, बिन गांडीव के आप सँभालो
हम तो गीता के कर्म सिद्धान्ती हैं, सुदर्शन आपको चलना है
अश्वस्थामा मरा अभी भी नही सिर्फ धोखा द्रोण को हुआ था
कर्ण कब कम था, उसका रथ वहाँ धँसा जहाँ पुराना कुआँ था
लद गए दिन अब ब्रज में होली के, जब तो आप थे राधा संग
महाभारत महज सत्य की
विजय गाथा, अब नही रमता किसी के तन मन पर सत्य का रंग... .. ..(4)
सादर: शिव राम मीमरोठ

रगों का रंग राग दिल में।


पहले परिवारवाद था, कतई नहीं था विचारों में रँग
समय के साथ बुराई फ़ियादिनी बन बैठी अच्छाई संग
समदर्शी बहन पर भाई हिरणकश्यपी कपटी रँग
यूँ कपट मन्त्रणा करने लगी, न करो प्रह्लाद से जंग
नेकी सच प्रतीक प्रह्लाद का धोखे से शमन की ठाणाली,
लड़कपन में नन्ना मुन्ना प्रह्लाद गोदी में बैठ गया भुआ संग
निठल्ली स्वार्थी कपटी झूठी भुआ होली की रँग रंगीली
मीठी मीठी प्यारी प्यारी गुलाबी बातें मानली,,,,,,,,,,(1)
हिरणकश्यप दूषित विचारधारा का असबाब लिए
बाजार में रावण , कंस सा बन गया सर्पदंश सा
होली का भतीजे से कपटतापुर्ण मधुर व्यवहार,
रिस्तो का प्यार प्रेम नही था केवल दिखावा था
नफरत से शुरू पर्व होलिका प्रेम से होली जलाते
आज तलक मानवता थकी नहीं ना ही राक्षस जले
ना मानवता में सच्चा प्रेम बढ़ा, न त्याग बड़ा,
सबसे ज्यादा स्वार्थ बड़ा मानवता में बहुमतवश
बे वजह बेवक्त ही गलती से गलतफहमी में हमने
उसके कपट को प्यार का रंग-गुलाल मानली .......(2)
एक दिवस का रंग टिकाऊ नही, 365 दिन रँगे रँग में
समाज के अंगरखा देखों पूरा रँगा झूठ भेदभाव का रंग,
चिलमन के पीछे असमानताओं से भरा फर्क का रंग
भारत की जीव्हा पर हर रात सवेरे तक जातिवाद का रंग
जिस्मपरस्ती विदेशों में जिस्म की चमड़ी के रंग का रंग
प्रोफ़ेशनल निठल्ले चमचों की चाटुकारिता वाकपटुता का रंग
भारत हलाल दफतरि दर्जें , एकम व दोयम दर्जे का रंग
सिक्के के दोनों पहलू राजनीति-प्रशासन दलाली -रिश्वत संग
अनायास ही मुद्दतोंसे हमने मुस्करके सच्चाई जानली,,,,,,,(3)
शिव राक्षसों को, राम रावण को, सिंघम ने हिरणकश्यप को
गोविंद आपका एक नही, असंख्य कन्सो से वास्ता पड़ेगा
कैसे कैसे साधना हैं निशाना, बिन गांडीव के आप सँभालो
हम तो गीता के कर्म सिद्धान्ती हैं, सुदर्शन आपको चलना है
अश्वस्थामा मरा अभी भी नही सिर्फ धोखा द्रोण को हुआ था
कर्ण कब कम था, उसका रथ वहाँ धँसा जहाँ पुराना कुआँ था
लद गए दिन अब ब्रज में होली के, जब तो आप थे राधा संग
महाभारत महज सत्य की
विजय गाथा, अब नही रमता किसी के तन मन पर सत्य का रंग... .. ..(4)
सादर: शिव राम मीमरोठ

साइकिल

कक्षा 9वीं में मुझे दी थी पिताजी ने खरीदकर साइकिल साइकिल पुरानी जान से प्यारी वो दिल को अजीज थी

पहला प्रेम पहला इश्क पहली मोहब्बत हुई साइकिल से , स्कूल पैदल जाते साइकिल पाने की इच्छा अजीब थी
साइकिल का सपना साकार हुआ पैरों को जूते मिले नही
चप्पल पहन साइकिल चलाते थे मालीहालत गरीब थी
फ्रेम टूटा हुआ वेल्डिंग से जुड़ा फिर भी मन को भाया था
टायर घिसे हुए पंचर बनी हुई वो मेरे दिल के करीब थी
ब्रेक एक ही लगता था फिर भी टक्कर नही होती थी
मै उसका मालिक था, फिर मुझे लगा,वो मेरा नसीब थी
शौक से चलाते थे चाव में दौड़ाते थे हवाई जहाज बनाते
हर रोज स्कूल जाते वा आते चैन उसकी खूब उतरती थी
चैन उतरने पर भी खेत दो खेत पगडंडी पर भी दौड़ती
पगडंडी में मैड या चढ़ाव में बिन चैन वो कैसे चढ़ती थी
चैन चढ़ा कर वापस बैठे गंदे हाथ ग्रीस की बालो में पोंछे
पहियों में बल पड़ा हो या ताडिया टूटी हो चैन उतरती थी
साइकिल मिस्त्री के स्पैनर / पाना में छेद अठारह होते थे
पहिया खोले पंचर जोड़े साइकिल में हवा फ्री भरती थी।
चैन उतरने पर भी पैडल मारने की कदम ताल जारी हो
हौसला अफजाई वो भी आजमाती थी और लुढ़कती थी
पहले साइकिल न तो गंदी होती थी न उन्हें कोई धोता था
वो एटलस हरक्यूलस हीरो ए _वन हो कर चमकती थी
जब गिरते थे साइकिल से तो कभी वो ऊपर कभी हम
गुत्थम गुत्था होते साइकिल मेरी मेरी जान बचाती थी
सादर : शिव राम मीमरोठ
@ कॉपी राइट रिजर्व

शायद गलती मेरी है।


हम कल भी गलत थे हमे आज लगता हर गलती मेरी है, कल भी शायद लोग बेबात कहेंगे की हर गलती मेरी हैं।
बचपन में खेलते ज्यादा थे पढ़ते हम कभी कभार
बच्चों को खेल से रोक पढ़ाई में झोके तो गलती मेरी है।
बचपन में पैदल चलते तो साइकिल से टकराते खुद को
साइकिल निर्जीव है नही रुकी तो क्या गलती तो मेरी है।
मैं साइकिल ले आया अब रास्ते में गिलहरी बकरी भेड़
आ टक्कराई साइकिल से तो मुझे लगा गलती मेरी है।
अब वहीं साइकिल में टक्कर मारी मोटरसाइकिल ने
मुझे लगा बाइक तो बड़ी है, मै ही रुकता गलती मेरी है।
युवा हुए शादी में मोटरसाइकिल होंडा मिली खूब दौड़ाई
साइकिल आ टकराईं हमे साइकिल छोटी गलती मेरी है।
प्रौढ़ हुए मारुति से चले तो कोई छोटा साधन सड़क पर
जबरन टक्कर मारुति में मारे तो हमे लगे गलती मेरी है।
सादर: शिव राम मीमरोठ
(c) कॉपी राइट रिजर्व
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