दोस्तों !...... दोस्तों !... दोस्तों !...
दोष देना बंद करो
हमरे भारतवर्ष को , दोस्तों
हमरे हिंदुस्तान को हिंदुस्तनियों
इसे
तो, हमें तो, हमरे इंडिया को
सब वशीयत में मिला है हमको !
हस्थीनापुर , आर्यावर्त और इन्द्रप्रस्थ से,
दिल्ली सी संसद और दुशासन से दागी सांसद
और महारथी कर्ण से मूक बधिर महामंत्री
सब वशीयत में मिला है !
पितामह भीष्म सा समर्पित राष्ट्नायक राष्टपति
मामा शकुनी सा शुभचिंतक महामहिम राज्यपाल
वसीयत में मिले मिले पडोसी और पड़ोसन
पाक चाइना बन क्र जन्मे जयद्रथ जरासंध्र
समाजिक और राजनितिक कमजोरियां,
व्यक्तिगत बुराइयें, पौराणिक प्रथाएं,
अन्धविश्वास एवं फर्क की राजनीति ।
अग्रज धृतराष्ट की जन्मांधता
बाहर और भीतर से,
दोनों तरह से : तन से और मन से अंधता,
आँखों से तो था ही अँधा,
परन्तु था मन से भी अँधा
अंधे की आँखों में चमक थी की येन केन प्रकारेण
पुत्र दुर्योधन बने राजा !
आज भी घर समाज और राजनीती में प्रचलित हैं,
यही वंशवाद परम्परा भी थी
पहला कारण महाभारत का।
कुंती का चाल चलन,
ऋषि दुर्वासा का वरदान
सूर्य संग गुप्तगुं जो की लडकपन में
कर्ण के रूप सूर्य की धुप में,
नदीं में बहा दी ममता,
फिर भी कहलाई राजमाता!
आँचल के दाग छुपाने में माहिर पृथा,
बेदाग आँचल बचा न सकी पांचाली का
कुंती बेबस थी खुद का दामन थामने मे,
जो खोल देती राज राजमाता राजसभा में,
पुत्र कर्ण !
तुम पांडवों में श्रेष्ठ हो,
पांचाली द्रोपदी के जेष्ठ हो !
कसम ! क़ायनात की
छूआ भी जो आँचल कुलवधू का,
कर्ण के हाथों,
कौरव राजसभा में धुर्योधन के चीथड़े चीथड़े होते ,
कुंती का यूँ मौन रहना, द्रोपदी का अपमान होना भी था
दूसरा कारण महाभारत का,
वंशवाद -जेष्ठता, पराक्रम से मूल रूप से वास्तविक उत्तराधिकारी था,
आर्य कुल का , हस्तिनापुर का
माहरथी कर्ण !
परन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनाना
महात्मा व्यास का ,
जननी राजमाता कुंती का
वयोवृद्ध पितामह भीष्म का
धर्मरक्षक वासुदेव का
यूँ तथ्यों को नजर अंदाज करके योग्यता गला घोटना
सभस्थलों में कर्ण का अनादर करना या देखना भी था
तीसरा कारण महाभारत का।
गंगा पुत्र देवव्रत का आजीवन ब्रह्र्चार्य व्रत की
भीष्म प्रतिज्ञा महज सफलता भर थी
पितामह भीष्म की नपुसंकता छुपाने की और
मान सम्मान और प्रतिष्ठा
Modern “Protocol"
पाने की थोथी चाह में / लालच में
आर्यव्रत के सभास्थलों में
दुराचारी व्यभिचारी अत्याचारी दुर्योधन के
अत्याचारों को खुली आँखों से देख के भी
भीष्म का संजीदा गूंगापन, मुकदर्शिता,हठता भी थी
चौथा कारण माहभारत का
दो नावों में तैरने की पारंगतता
तराजू के दोनों पलड़ों में बाँट रखने में विख्यात
सम्पूर्ण आर्याव्रत का गुरु, कौरव पांडवों का कुलगुरू
आचार्य द्रोण, गुरुद्रोण का दोगलापन
प्रेम अर्जुन से एवम पक्ष कौरवों का
सदैव ही सभास्थलों और युद्धस्थलों में
राजगुरु में शिष्य प्रेम से ज्यादा पुत्र मोह
पुत्र अशवस्थामा का मित्र मोह ने दुर्योधन को सम्बल दिया
राष्टीय पथप्रदर्शक की नैतिक पंगुता भी थी
पांचवा कारण महाभारत का
रूप सुन्दरी स्वप्न सुन्दरी क्षत्राणी कर्ण की पत्नी की देवरानी ने
स्वंवर में महारथी कर्ण को अक्षत्रि कह के
रोक दिया था प्रतिंच्या चढाने से धनुष पर
चिन्ह जो बने थे प्रतिंच्या से उँगलियों में,
पांचाली के नस्तर से शब्द पर निकल गये पर दिल के
गुस्से में लाल पिला हो के, कर्ण बहार निकल गया महफ़िल के,
राधा पुत्र महारथी अंगराज के जख्म थे अभी हरे के हरे
वक्त ढंग से मलहम लगता पर वक्त को भी वक्त कम मिला
और
युधिष्ठर ने राजभिषेक के लिए भीष्म व्यास द्रौण दुर्योधन कर्ण को
इन्द्रप्रस्थ उत्सव का न्योता जो भेजा,
साज सज्जा और असबाब ले युवराज जा धमका
चाँद की चांदनी में महल के जलाशय को समझा संगमरमर की फर्स
जलमग्न हुए युवराज दुर्योधन के उघड जो गये राजसी वस्त्र
जलमग्न दुर्योधन जलाशय में बेहाल देखके, कर्ण की भ्रकुटी कुछ यूँ तनी की
देखता हैं ! जलाशय स्वंवरसा जलपात्र और
समय का धूमता पहिये पर दुर्योधन सी मछली
आव देखा न, तांव देखा इन्द्रप्रस्थ की कुलवधू ने,
समझे बिना ही नजरों की नजाकत
अंधे का अँधा हस्तिनापुर युवराज को कह डाला ,
जल से जल्लाद सा गरजा दुर्योधन मित्र, कर्ण !
मुद्दा राज का नही, साम्राज्य का नही अब तो दोस्त !
मसला ! जर का नही, जोरू का नही, दोस्त, जमीं का भी नही
अस्त्रों का नही, शस्त्रों का नही दोस्त ! ,
मुद्दा मेरे राजसी वस्त्र का है,मुद्दा वस्त्रों का हैं !
मैं लूँगा बदला वस्त्रों का वस्त्रों से........
इद्र्प्रस्थ उत्सव में द्रोपदी के ये तीखे बोल भी थे
छ्ठा कारण महाभारत का।
कृष्ण की विद्वता, सहजता, अलौकिकता, धर्मपरायणता
कृष्ण ! अर्जुन का दोस्त सगा और सलाकार भी था
कुंती का खास भतीजा होना उसकी भी कमजोरी थी,
अर्जुन की इकलोती पत्नी अभिमन्यु की माँ “ सुभद्रा ”
दूरदराज से नही थीं वो, कृष्ण कुल के यादवों की छोरी थी
इतना सब कुछ जन बुझ कर, क्यों अनजान बने रहे कान्हां ?
क्यां भारी था, अलौकिक सुदर्शन पर लौकिक दुर्योधन ?
गर्दन काट फेंकता कब का, पर वो तो विधाता था ?
“ राधा ने कसम जो कान्हा को दिलवायीं “
इन उँगलियों से बंसी की मधुर धुन सुन के
मथुरा वृन्दावन,बाल गोपाल गोपियाँ, मन्त्र मुग्ध कियें
जिन उँगलियों पर, गोवर्धन धरा और जनता को इंद्र से भय मुक्त किया
जो हाथ प्यार के हैं, उन हाथों में कभी तुम ,
अपने हाथों में कान्हा, अस्त्र –सस्त्र मत लेना, विध्वंस कभी मत करना
जब जब पाप बढ़े दुनिया में, आपस में विध्वंस भलाई करवा देना,
कान्हा, अपने हाथों में अस्त्र –सस्त्र मत लेना, चाहे आफत कितनी आयें
जोरी से कोई वार करे, वार बचाके भग जाना,दूर कहीं छुप जाना
लोग भलाई रणछोड़ कहे, अजी कहते रहे ,दूर सुरक्षित भग जाना
मेरे कान्हा, हाथों में अस्त्र –सस्त्र मत लेना,
विपदा कोई और बड़ी सी / भी आजायें,
गोकुल छोड़ो, मथुरा छोड़ो , चाहे छोड़ो वृदावन दूर कहीं चले जाना
राधा ! मैं वादा करता हूँ अस्त्र सस्त्र नही छुहुंगा
जरूरत पड़ी तो रण में भी रणछोड़ के भग लूँगा, पर अस्त्र सस्त्र नही छुहुंगा
चाहे रणछोड़ कहलाऊंगा,
पूर्व के गोकुल,मथुरा, वृदावन छोड़के पश्चिम में दूर द्वारका बसाऊंगा .
जो कान्हा ने स्वीकारी , राधा की वो मदुर कसम भी थी
सातवां कारण महाभारत का.
सादर : शिव राम मीमरोठ