" परिवेश नही सुनने को तैयार"
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मन के उदगार मुफ्त में क्योँ उजागर करूँ।
आजतलक मन मन्दिर मे भरी हुई नेकता
दिनचर्या में विविधता, सिद्धान्तों में एकता ।
परिवेश में नही, कोई, सच सुनने को तैयार
मेरीकविताएं सुनते/ती है दर्पण और दीवार।
जन्म के वक्त बच्चो के साफ स्वस्छ मन मे
नेकी-भलाई, सॉफ्टवेयर बूटेबल फोरम में ।
खुदा अपलोड करके भेजता है हर इंसान में
दबाव में, स्वार्थ में एडिट करलिया इंसान ने।
फिर संगति से वायरस आगया पवित्र मन मे
लालच में मछली भी दूध मांगती हैं जल में।
हाँ ! मेने कसम खाई हैं अच्छा बना रहने की
अदृश्य फ़रिशतो ने ठानली तंग करने की।
हर रोज टूटता हूँ, बिखरता हूँ, सम्भलता हूँ,
होली रंग से साफा हलाल होने से बचाता हूँ।
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